Tuesday, 25 August 2015

थोड़े गंभीर पल

यारों गम में भी मुसकराना पलकों पे जग को खुशी देना 
मजबूरी हकीकत कोई न समझे मेरे लबजो को राह देना |
कहना था राह दिखाना पर कांटे लबजो की दीवार बन सजे 
दिल में कभी खुदगरजी नहीं थी पर ही खुदगर्ज बन बैठे |
कभी सपने में दुख नहीं दिया पर लब्ज विष का घाव बन गए 
हम चलते फिरते दीवाने भावों के गहरे भँवर में फसते चले गए |
हम कभी गलत नहीं थे न कभी होंगे चाहे दुनिया सारी सोचे
पलकों पे बिठाने वाले कभी आसियाना तोड़ा नहीं करते|

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