Tuesday, 25 August 2015

धर्म सत्य की अनुभूति है,

धर्म सत्य की अनुभूति है, सभी धर्म अपने -२ ढंग से सत्य को खोजने का प्रयास करते है,धार्मिक पुरूष" नैतिक गुणों का पुंज"होता है नैतिक गुणों के अभाव में किसी भी व्यक्ति को
" धार्मिक नही कहां जा सकता है|
नैतिकता के अभाव में धर्म स्वयं, अधर्म ( ढोंग ,पाखंड,प्रदर्शन ,उंचनीच,अन्याय ,अत्याचार आदि) का प्रचारक बन जाता है,वर्तमान में अधिकतर ये ही हो रहा है|काल्पनिक कथाओ,किवदंतियों एवं करोडो देवी देवताओ के नाम पर आस्था के केन्द्रों को बिजनेस केन्द्रों में तब्दील कर रखा है|
नैतिकता ही धर्म और अधर्म की विभेदक है,
निहित स्वार्थ सिद्धि के लिए धर्म को लेकर तर्क का ताना बाना बुनना एक बहाना मात्र है,ताकि धर्म के नाम पर" अमानवीय वृतियों को खुलकर बढावा मिल सके|
सदियों से कुछ षडयंत्रकारी ऐसा जाल बुन करधर्म के नाम पर गरीबों का गला घोंट रहे है
आतंक और उन्माद को बढा रहे है, धर्म की दुहाई देने से अनैतिकता धर्म नही बन सकती|
स्वर्ण के पात्र को देखकर ही, यह समझना कि
उसमें अमृत है,बडी भूल है|
आज हम निम्न/ मध्यम वर्ग के लोग यही बडी भूल कर रहे है|
नैतिकता का प्रमुख केन्द्र बिन्दु मानव है, नैतिक व्यक्ति को यह विश्वास होता है कि उसे उन्ही कर्मों का फल भोगना है,जिनको उसने अपनी स्वतंत्र इच्छा से किया है|
कर्म- फल- भोग के लिए किसी भी व्यक्ति को विवश नही किया जा सकता है, मानव स्वयं कर्म का कर्ता और कर्म फल का प्रदाता है,वह स्वयं कर्म करता है और तदानुसार कर्म फल भोगता है|
ईश्वरअथवा कोई भी अति प्राकृतिक सत्ता कर्मफल सम्बन्ध में हस्तक्षेप नही करती है|
नैतिकता शुभ से सम्बन्धित है, शुभ ही मानव व्यक्तित्व केविकास में सहायक है, नैतिक गुण व्यक्ति में सामाजिकता की भावना पैदा करते है जो उसे स्वार्थ की परिधि से ऊपर उठाकर समाज कल्याण के लिए प्रेरित करते है|
नैतिकता कर्तव्य- अकर्तव्य,शुभ-अशुभ,पाप-पुण्य की विवेचना करती है,इस प्रकार नैतिकता मानव को सदाचरण की शिक्षा देती है तथा उसे प्रगति के मार्ग पर अग्रसर करती है|नैतिक मूल्यऔर सदाचरण ईश्वर के आदेशों पर निर्भर नही है, बिना ईश्वर को मानें भी व्यक्ति नैतिक हो सकता है| जैनऔर बौद्ध धर्म इसके उदाहरण है|
यदि भय और प्रलोभन से व्यक्ति नैतिक नही बन सकता,नैतिक आचरण तो स्वतंत्र इच्छा शक्ति से प्ररित होता है|
प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्शे ने कहां है कि नैतिकता धर्म के बिना भी संभव है,एक व्यक्ति बिना धर्म के भी चरित्रवान हो सकता है तथा धार्मिक मठाधीश अनैतिक आचरण से जेल में है|
नैतिकता धर्म पर निर्भर न होकर आत्मनिर्भर है नैतिकता में धर्म का पुट खोजना अनावश्यक प्रतीत होता है,अनेक आधुनिक विचारको ने भी नैतिकता को धर्म से रहित बताया है|
इनका मानना है कि धर्म ने ईश्वर के विचार को प्रस्तुत कर नैतिकता को हानि पहुंचाई है|
निष्कर्षतः- धर्म के लिए नैतिकता अनिवार्य है
नैतिकता के लिए किसी धर्म केआवरण की जरूरत नही है|
साभार- नव चिंतन दै.भा.

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