Sunday, 10 May 2020

व्यायाम: सर्वदा पथ्य: कक्षा 10 प्रश्नोत्तर अभ्यास पी पी टी

डिजिभारतम् पाठस्य प्रश्नोत्तर अभ्यास

संस्कृत स्वराः |

व्यायाम: सर्वदा पथ्य: कक्षा 10

सदैव पुरतो निधेहि चरणं

सुभाषितानि कक्षा 8

डिजिभारतं कक्षा 8

Wednesday, 6 May 2020

व्यायाम सदा पथ्य:


व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं।
 आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम् ॥

 भावार्थ :
व्यायाम से स्वास्थ्य, लम्बी आयु, बल और सुख की प्राप्ति होती है। निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं ।
व्यायामं कुर्वतो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम् ।
 विदग्धमविदग्धं वा निर्दोषं परिपच्यते ॥
 भावार्थ :
व्यायाम करने वाला मनुष्य गरिष्ठ, जला हुआ अथवा कच्चा किसी प्रकार का भी खराब भोजन क्यों न हो, चाहे उसकी प्रकृति के भी विरुद्ध हो, भलीभांति पचा जाता है और कुछ भी हानि नहीं पहुंचाता ।
शरीरोपचयः कान्तिर्गात्राणां सुविभक्तता ।
 दीप्ताग्नित्वमनालस्यं स्थिरत्वं लाघवं मृजा ॥
 भावार्थ :
व्यायाम से शरीर बढ़ता है । शरीर की कान्ति वा सुन्दरता बढ़ती है । शरीर के सब अंग सुड़ौल होते हैं । पाचनशक्ति बढ़ती है । आलस्य दूर भागता है । शरीर दृढ़ और हल्का होकर स्फूर्ति आती है । तीनों दोषों की (मृजा) शुद्धि होती है।
न चैनं सहसाक्रम्य जरा समधिरोहति ।
 स्थिरीभवति मांसं च व्यायामाभिरतस्य च ॥
 भावार्थ :
व्यायामी मनुष्य पर बुढ़ापा सहसा आक्रमण नहीं करता, व्यायामी पुरुष का शरीर और हाड़ मांस सब स्थिर होते हैं ।
श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनां सहिष्णुता ।
 आरोग्यं चापि परमं व्यायामदुपजायते ॥
 भावार्थ :
श्रम थकावट ग्लानि (दुःख) प्यास शीत (जाड़ा) उष्णता (गर्मी) आदि सहने की शक्ति व्यायाम से ही आती है और परम आरोग्य अर्थात् स्वास्थ्य की प्राप्ति भी व्यायाम से ही होती है ।
न चास्ति सदृशं तेन किंचित्स्थौल्यापकर्षणम् ।
 न च व्यायामिनं मर्त्यमर्दयन्त्यरयो भयात् ॥
 भावार्थ :
अधिक स्थूलता को दूर करने के लिए व्यायाम से बढ़कर कोई और औषधि नहीं है, व्यायामी मनुष्य से उसके शत्रु सर्वदा डरते हैं और उसे दुःख नहीं देते ।
समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः । प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥
 भावार्थ :
जिस मनुष्य के दोष वात, पित्त और कफ, अग्नि (जठराग्नि), रसादि सात धातु, सम अवस्था में तथा स्थिर रहते हैं, मल मूत्रादि की क्रिया ठीक होती है और शरीर की सब क्रियायें समान और उचित हैं, और जिसके मन इन्द्रिय और आत्मा प्रसन्न रहें वह मनुष्य स्वस्थ है ।

11

वयोबलशरीराणि देशकालाशनानि च।
समीक्ष्य कुर्याद् व्यायाममन्यथा रोगमाप्नुयात्॥११॥

शब्दार्थ

·                     वयोबलशरीराणि - उम्र, ताकत और शरीर
·                     देशकालाशनानि - इलाका, समय और भोजन
·                     च - और
·                     समीक्ष्य - देखकर
·                     कुर्यात् - करना चाहिए
·                     व्यायामम् - व्यायाम
·                     अन्यथा - नहीं तो
·                     रोगम् - बीमारी
·                     आप्नुयात् - प्राप्त करें

 अन्वय 

(मनुष्यः) वयोबलशरीराणि देशकालाशनानि च समीक्ष्य (एव) व्यायामं कुर्यात्। अन्यथा (सः) रोगम् आप्नुयात्।

मनुष्य ने (अपनी) उम्र, ताकत, शरीर, (जहां रह रहा हैं वह) इलाका, समय (ऋतु वगैरह) और भोजन (इन सभी चीजों को) देख कर ही व्यायाम करना चाहिए। नहीं तो वह रोग को प्राप्त करेगा।

यह प्रस्तुत पाठ का अन्तिम श्लोक है। इस श्लोक में कहा गया है कि हमें व्यायाम तो करना ही चाहिए लेकिन कुछ चीजों का ध्यान रखकर। और वे चीजें हैं - वयः (उम्र), बलम् (ताकत), शरीरम्, देशः (इलाका), कालः (समय/ऋतु) और अशनम् (भोजन)।

 वयः 

उम्र के हिसाब से हमें अलग अलग व्यायाम पद्धति चुननी चाहिए। छोटे बच्चें और वयोवृद्ध लोगों को ज्यादा मुश्किल और भारी भरकम व्यायाम नहीं करने चाहिए। और युवकों को भी अपनी मर्यादा में रहकर ही व्यायाम करना चाहिए।

बलम् 

अपने शरीर में जितनी शक्ति है उसके अनुसार ही व्यायाम करना चाहिए। अगर दो मित्रों ने व्यायाम करना आरम्भ किया और उसमें से एक को यदि पता चले की मेरा मित्र (दूसरा)  ज्यादा व्यायाम करता है। तो हो सकता है कि पहला ईर्ष्या से उसके जितना ही व्यायाम करने की चेष्टा करेगा। परन्तु ध्यान रहे कि हर कोई काम करता है तो अपनी क्षमता के अनुरूप काम करता है। हमने पिछले दो श्लोक यानी  श्लोक क्र॰ ९ और श्लोक क्र॰ १० में देखा है कि हमे व्यायाम कितना और कितनी देर तक करना चाहिए। उसके अनुसार ही सभी को व्यायाम करना चाहिए। और हमारे मित्र को या अन्य किसी को देखर उसके जितना व्यायाम तो कभी भी नहीं करना चाहिए।

शरीरम्

प्रत्येक व्याक्ति का शरीर अद्वितीय (Unique) होता है। प्रत्येक व्यक्ति की जीवनशैली भिन्न होती है। कुछ लोग दिन में ज्यादातर समय बैठे रहते हैं और कुछ लोगों का काम ही दिन भर घूमने का होता है। तो इस स्थिति में यह बात स्पष्ट है कि दोनों को भी अलग अलग प्रकार के व्यायाम की आवश्यकता होगी। 
आजकल मैं ने ज्यादातर विद्यालयों में पढने वाले छात्रों का निरीक्षण करके यह पाया की छात्र अधिकांश समय तक अपनी गर्दन नीचे झुकाकर रहते हैं।
पढते समय गर्दन नीचे।
लिखते समय गर्दन नीचे।
मोबाईल इत्यादि पर गर्दन नीचे।
कक्षा में शिक्षक डांटे तो गर्दन नीचे।
अब ऐसी परिस्थिति में छात्रों को सोचना चाहिए की हम दिन भर में ऊपर कितनी बार देखते हैं? अगर नहीं तो उन्हे ऐसे व्यायाम भी अपने जीवनकाल में शामिल करने चाहिए जिनमें ऊपर देखने का काम पडे।

देशः

हम जहाँ रहते हैं उस प्रदेश में जिस किस्म का अनाज और फल उगते हैं वे हमारे लिए श्रेष्ठ होते हैं। परन्तु यदि हम किसी कारणवश अपना प्रदेश छोड कर अन्य जगह जाएं तो वहां का अन्न संभवतः हमें हजम ना हो। जैसे कि उत्तर भारत में गेहूं ज्यादातर खाया जाता है तो इसके विपरीत दक्षिण भारत में चावल। इस परिस्थिति में हमे खुद का सन्तुलन बनाए रखना जरूरी होता है। अपचन होने की स्थिति में अपने व्यायाम पर भी इस का परिणाम जरूर होगा।
साथ ही साथ प्रदेश बदलने से मौसम में भी बदलाव देखने को मिलता है। उत्तर भारत किंचित शीतल है तो दक्षिण भारत में उष्णता ज्यादा है। और हम इस बात का अनुभव कर सकते हैं कि शीतलता के समय हम अधिक व्यायाम करन में आनन्त मिलता है। परन्तु उतना ही व्यायाम उष्णता के समय करना मुष्किल हो जाता है। इसीलिए प्रस्तुत श्लोक कहता है कि देश को भी देख कर  व्यायाम करना चाहिए।

कालः 

यहाँ पर काल से मतलब है काल के अनुसार वातावरण में होने वाले बदलाव। यानी ऋतुएं। अलग अलग ऋतुकालों में बदलते वातावरण का परिणाम शरीर पर होते रहता है। और हमें व्यायाम में उसके अनुरूप बदलाव करने पडते हैं।

अशनम्

अशन इस शब्द का अर्थ होता है भोजन। यानी हम क्या खाते हैं? कितना खाते हैं? इस चीज को देखकर हमें व्यायाम करना चाहिए। अब यह तो जाहिर सी बात है कि यदि हम ज्यादा खाना खाते हैं, भारी भरकम खाना खाते हैं तो हमे व्यायाम भी ज्यादा ही करना पडेंगा।
और अगर हम इन बातों को देख कर व्यायाम नहीं करेंगे, तो हमें बीमारियों का शिकार बनना पडेंगा।

व्याकरण

·                     वयोबलशरीराणि
o                  वयः + बल। इति उत्वसन्धिः।
o                  वयः च बलं च शरीरं च - वयोबलशरीराणि। इति इतरेतर - द्वन्द्व - समासः।
·                     देशकालाशनानि
o                  काल + अशनानि। इति सवर्णदीर्घसन्धिः।
o                  देशः च कालः च अशनं च - देशकालाशनानि। इत इतरेतर - द्वन्द्व - समासः।
·                     समीक्ष्य - सम् + ईक्ष् + ल्यप्। उपसर्गः + धातुः + प्रत्ययः।
·                     कुर्याद् व्यायामम् - कुर्यात् + व्यायामम्। इति जश्त्वसन्धिः। कचटतप – गजडदब
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दशमः श्लोकः हमारी आधी शक्ति समाप्त हो चुकी है यह कैसे पता करें?

हृदिस्थानस्थितो वायुर्यदा वक्त्रं प्रपद्यते।
व्यायामं कुर्वतो जन्तोस्तद्बलार्धस्य लक्षणम्॥१०॥

शब्दार्थ

·                     हृदिस्थानस्थितः - छाती में स्थित (रहनेवाला)
·                     वायुः - हवा
·                     यदा - जब
·                     वक्त्रम् - मुखम्। 
·                     प्रपद्यते - प्राप्नोति। पहुंचता है
·                     व्यायामम् - व्यायाम
·                     कुर्वतः - करनेवाले
·                     जन्तोः - जीवस्य। प्राणिनः। (मनुष्यस्य)। 
·                     तत् - वह
·                     बलार्धस्य - आधी शक्ति का
·                     लक्षणम् - निशान

अन्वय

यदा व्यायामं कुर्वतः जन्तोः हृदिस्थानस्थितः वायुः वक्त्रं प्रपद्यते, तत् बलार्धस्य लक्षणम् (भवति)

जब व्यायाम करने वाले मनुष्य के फेफडों में रहने वाला वायु (सांस) मुंह तक पहुंच जाता है, (तो) वह आधे बल का निशान होता है।


हमने पिछले श्लोक में पढा है कि व्यायाम कब तक किया जाना चाहिए। हमारा पूर्वोक्त श्लोक कहता है कि  मनुष्य ने अपनी आधी शक्ति खत्म होने तक ही हररोज व्यायाम करना चाहिए। अन्यथा हमारी हानि हो सकती है। परन्तु व्यायाम करते समय हम कैसे समझ सकते हैं कि हमारी आधी शक्ति समाप्त हो चुकी है?
इसका उत्तर यह श्लोक देता है। यह श्लोक कहता है कि हृदिस्थान में स्थित वायु यानी हमारे फेफडों में जो हवा होती है वह जब मुंह में आने लगती है, यानी सांस फूलने लगती है, तो हम समझ जाना चाहिए कि अब हमारी आधी शक्ति समाप्त हो चुकी है। अब हमें अपना व्यायाम रोक देना चाहिए।

परीक्षा की दृष्टि से अभ्यास के लिए इस कड (लिंक) पर जाएं -

https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSd_4APJxQltsuGN3k-9dgq0V_WXJsR_Ky_BkPwtr1wEOMVsRA/viewform?usp=sf_link 

व्याकरण

·                     हृदिस्थानस्थितः
o                  हृदि स्थानम् - हृदिस्थानम्। इति सप्तमीतत्पुरुषः।
o                  हृदिस्थाने स्थितः - हृदिस्थानस्थितः। इति सप्तमीतत्पुरुषः।
·                      हृदिस्थानस्थितो वायुः - हृदिस्थानस्थितः + वायुः। इति उत्वसन्धिः।
·                     वायुर्यदा - वायुः + यदा। इति रुत्वसन्धिः।
·                     कुर्वतो जन्तोः - कुर्वतः + जन्तोः। इति उत्वम्।
·                     कुर्वतः - कृ + शतृप्रत्ययः। षष्ठी विभक्तिः।
·                     जन्तोस्तत् - जन्तोः + तत्। इति सत्वसन्धिः। विसर्गस्य स्।
·                     बलार्धस्य - 
o                  बल + अर्धस्य। इति सवर्णदीर्घसन्धिः।
o                  बलस्य अर्धस्य। इत षष्ठीतत्पुरुषः समासः।








व्यायाम कितनी देर तक करना चाहिए?

नवमः श्लोक -

सर्वेष्वृतुष्वहरहः पुम्भिरात्महितैषिभिः।
बलस्यार्थेन कर्तव्यो व्यायामो हन्त्यतोऽन्यथा॥९॥

शब्दार्थ -

·                     सर्वेषु - सभी
·                     ऋतुषु - ऋतुओं में
·                     अहरहः - प्रतिदिनम्। हररोज (अहः च अहः च)
·                     पुम्भिः - पुरुषैः। पुरुषों के द्वारा (तृतीयाबहुवचनम्)
·                     आत्महितैषिभिः - जो खुद का भला चाहते हैं उनके द्वारा
·                     बलस्य - शक्तेः। ताकत के
·                     अर्धेन - अर्धभागेन। आधे हिस्से से
·                     कर्तव्यः - करणीयः। किया जाना चाहिए
·                     व्यायामः - शरीरायासजननं कर्म।
·                     हन्ति - मारयति। मार देता है। (हानि करता है)
·                     अतः - इस से
·                     अन्यथा - इसके अलावा


अन्वय -

आत्महितैषिभिः पुम्भिः सर्वेषु ऋतुषु  अहरहः बलस्य अर्धेन व्यायामः कर्तव्यः। अतः अन्यथा हन्ति।

जो लोग खुद का भला चाहते हैं ऐसे पुरुषों ने सभी ऋतु हमें हर दिन अपनी शक्ति के  आधी शक्ति से व्यायाम करना चाहिए।  इसके अलावा ( यानी ज्यादा  व्यायाम किया जाए तो) हानि करता है। 

जो लोग हर रोज व्यायाम करते हैं उनके लिए एक चेतावनी यह श्लोक दे रहा है। हम यदि हररोज व्यायाम कर रहे हैं, तो हमे कितनी देर तक व्यायाम करना चाहिए?
प्रस्तुत श्लोक कहता है कि हमें केवल अपनी आधी ताकत समाप्त होने तक ही व्यायाम करना चाहिए। 
अब फिर से सवाल उठता है कि हमें समझे कैसे कि हमारी आधी ताकत समाप्त हो चुकी है, अब हमें रुकना चाहिए? इसका उत्तर अगला श्लोक देता है। अगले श्लोक के लिए यहाँ क्लिक करें।


भावार्थ -

ये जनाः स्वहितम् इच्छन्ति, तैः जनैः सर्वेषु ऋतुषु अर्थात् आवर्षं प्रतिदिनं व्यायामः करणीयः। परन्तु सः व्यायामः शरीरस्य अर्धेन एव बलेन करणीयः। नो चेत् शरीरस्य हानिः भवति।

व्याकरणम् -

·                      सर्वेष्वृतुष्वहरहः - सर्वेषु + ऋतुषु + अहरहः। इति यण् सन्धिः।
o                  अहरहः - अहः च अहः च।
·                     पुम्भिरात्महितैषिभिः - पुम्भिः + आत्महितैषिभिः। इति रुत्वसन्धिः।
o                  पुम्भिः - पुंस् + तृतीयाबहुवचनम्
·                     बलस्यार्धेन - बलस्य + अर्धेन। इति सवर्णदीर्घसन्धिः।
·                     कर्तव्यो व्यायामो - कर्तव्यः + व्यायामो। इति उत्वसन्धिः।
o                  व्यायामो हन्त्यतो - व्यायामः + हन्त्यतो। इति उत्वसन्धिः।
§                हन्त्यतो - हन्ति + अतो। इति यण्सन्धिः।
§                     अतोऽन्यथा
§                          अतः + अन्यथा। इति उत्वसन्धिः पूर्वरूपसन्धिः च।

अष्टम श्लोक -

व्यायामो हि सदा पथ्यः बलिनां स्निग्धभोजिनाम्।
स च शीते वसन्ते च तेषां पथ्यतमः स्मृतः॥८॥

शब्दार्थ -

·                     व्यायामः - परिश्रममेहनत
·                     हि - एक अव्यय पद
·                     सदा -  सर्वदा।  सदैव। हमेशा
·                     पथ्यः -  हितकरः। फायदेमंद
·                     बलिनाम् - बलवान लोगों का ( यहां -  बलवान लोगों के लिए)
·                     स्निग्धभोजिनाम् - स्निग्ध पदार्थ खाने वाले लोगों का (यहां - के लिए)
·                     सः - वह
·                     च - और
·                     शीते - ठंडी में
·                     वसन्ते - वसंत ऋतु में
·                     च - और
·                     तेषाम् - उनका (यहां - उनके लिए)
·                     पथ्यतमः - सबसे ज्यादा फायदेमंद
·                     स्मृतः -  माना गया है

अन्वय -

स्निग्धभोजिनां बलिनां हि व्यायामः सदा पथ्यः (अस्ति)। शीते च वसन्ते च सः तेषां पथ्यतमः स्मृतः।

जो लोग स्निग्ध पदार्थों का भोजन करते हैं, बलवान होते हैं उनके लिए तो व्यायाम हमेशा फायदेमंद है।  ठंडी में और वसंत ऋतु में वह (यानी व्यायाम) उनके लिए  सबसे ज्यादा फायदेमंद माना गया है।


स्निग्धभोजी यानी स्निग्ध पदार्थों का भोजन करने वाला।
स्निग्धभोजिनः - स्निग्ध भोजन करने वाले। यह बहुवचन है।
स्निग्धभोजीनाम् स्निग्ध भोजन करने वालों का। यह षष्ठी बहुवचन है।
स्निग्ध पदार्थ यानी घी, मख्खन, तेल, चर्बी (Fat) इत्यादि चिकनाई वाले पदार्थ। इन पदार्थों में सबसे ज्यादा ऊर्जा होती है।  और यदि हम ऐसे स्निग्ध पदार्थ खाते हैं तो हमारे शरीर में उस ऊर्जा की खपत होने भी जरूरी है।  और उस ऊर्जा की खपत के लिए व्यायाम करना बहुत जरूरी होता है।

स्निग्धभोजिनाम् बलिनाम् - इन दो शब्दों को हम अलग-अलग दृष्टि से देख सकते हैं।  यदि हमने स्निग्धभोजिनाम्  इस शब्द को बलिनाम्  इस शब्द का विशेषण समझा, तो स्निग्धभोजिनाम् बलिनाम्  इसका अर्थ हो जाएगा -  स्निग्ध भोजन करने वाले बलवान लोग।  अब श्लोक के  पहले वाक्य का अर्थ होगा -  स्निग्ध भोजन करने वाले बलवान  लोगों के लिए व्यायाम हमेशा फायदेमंद होता है।

इन्हीं दो शब्दों को  यदि अलग-अलग स्वतंत्र पर माना जाए तो  स्निग्ध भोजन करने वाले लोग और बलवान लोग ( इन दोनों के लिए)  व्यायाम फायदेमंद  होता है।  ऐसा भी अर्थ हो सकता है।

भावार्थ -

ये बलिनः जनाः स्निग्धं भोजनं कुर्वन्ति, तेषां कृते व्यायामः अत्यन्तं हितकरः भवति।  यतः व्यायामेन खादितं भोजनं सम्यक्तया पच्यते। व्यायामः शीतकाले वसन्तकाले च इतोऽपि लाभदायी भवति। अतः प्रतिदिनं व्यायामः करणीयः एव।

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व्याकरणम् -

·                     व्यायामो हि - व्यायामः + हि। इति उत्वसन्धिः।
·                     पथ्यो बलिनाम् - पथ्यः + बलिनाम्। इति उत्वसन्धिः।
·                     बलिनाम्
o                  बल + इन् - बलिन्। इति इन्-प्रत्ययः।
o                  बलिन् + आम् - बलिनाम्। इति षष्ठी बहुवचनम्।
·                     स च - सः च। इति विसर्गलोपसन्धिः।
·                     स्मृतः - स्मृ + क्त। इति क्तप्रत्ययः।

व्यायाम करने वाला कुछ भी हजम कर लेता है।

सप्तमः श्लोकः 

व्यायामं कुर्वतो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम्।
विदग्धमविदग्धं वा निर्दोषं परिपच्यते॥७॥

शब्दार्थ - 

·                     व्यायामम् - कसरत
·                     कुर्वतः - करने वाले का
·                     नित्यम् - सदा। सदैव। हमेशा
·                     विरुद्धम् - विपरीतम्। उलटा
·                     अपि - भी
·                     भोजनम् - खाना
·                     विदग्धम् - पक्वम्। पका हुया
·                     अविदग्धम् - अपक्वम्। जो पका हुआ नहीं है
·                     वा - अथवा। या
·                     निर्दोषम् - बिना किसी परेशानी/गडबडी के,
·                     परिपच्यते - हजम हो जाता है

अन्वय - 

नित्यं व्यायामं कुर्वतः विरुद्धम् अपि भोजनम् , विदग्धम् अविदग्धं वा, निर्दोषं परिपच्यते।

हमेशा व्यायाम करनेवाले का विरुद्ध भी भोजन, पका हो या ना हो, बिना किसी गडबडी के पच जाता है।


इस श्लोक में विरुद्ध भोजन यह एक बात कही है। यहाँ विरुद्ध का अर्थ है ऋतु या काल  के विरुद्ध। यदि व्यायाम करने वाला ऋतु या समय के हिसाब उलटा भी अगर कुछ  खा ले, वह कच्चा हो या पका हुआ, उसकी अन्नपचन की शक्ति इतनी मजबूत रहती है कि वह खाया हुआ सबकुछ पच जाता है।
जैसे कि हम जानते हैं - गर्मी के समय में हमें ठंडी चीजें खानी चाहिए। जैसे कि शीतपेय, पानीदार फल। और गर्मी के मौसम में यदि हम उष्णता से भरपूर चीजें खा लेते हैं, तो परेशानी होती है। परन्तु व्यायाम करने वाला गर्मी में भी उष्ण चीजे खा सकता है और सर्दी में भी ठंडी चीजे खा सकता है।

 भावार्थ - 

ये जनाः नित्यं व्यायामं कुर्वन्ति ते यदि ऋतु-कालादिभिः विरुद्धम् अपि भोजनं कुर्वन्ति, तर्हि अपि तत् अन्नं पच्यते। तेषां भोजनं यदि पक्वम् वा अपक्वम् वा अपि भवेत्, तत् भोजनम् अपि पच्यते। अतः सर्वैः व्यायामः करणीयः।

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व्याकरण - 

·                     कुर्वतः 
o                  कृ + शतृ - कुर्वत्। इति शतृप्रत्ययः। करोति - करता है। कुर्वत् - करने वाला।
o                  कुर्वत् + अः - कुर्वतः। इति षष्ठीविभक्तिः। करने वाले का।
·                      अविदग्धम् - न विदग्धम्। इति नञ् - तत्पुरुषः।
·                     निर्दोषम् - दोषस्य / दोषाणाम् अभावः। इति अव्ययीभावसमासः।
·                     पच्यते - पच् + कर्मवाच्य।


अष्टम श्लोक -

व्यायामो हि सदा पथ्यः बलिनां स्निग्धभोजिनाम्।
स च शीते वसन्ते च तेषां पथ्यतमः स्मृतः॥८॥

शब्दार्थ -

·                     व्यायामः - परिश्रममेहनत
·                     हि - एक अव्यय पद
·                     सदा -  सर्वदा।  सदैव। हमेशा
·                     पथ्यः -  हितकरः। फायदेमंद
·                     बलिनाम् - बलवान लोगों का ( यहां -  बलवान लोगों के लिए)
·                     स्निग्धभोजिनाम् - स्निग्ध पदार्थ खाने वाले लोगों का (यहां - के लिए)
·                     सः - वह
·                     च - और
·                     शीते - ठंडी में
·                     वसन्ते - वसंत ऋतु में
·                     च - और
·                     तेषाम् - उनका (यहां - उनके लिए)
·                     पथ्यतमः - सबसे ज्यादा फायदेमंद
·                     स्मृतः -  माना गया है

अन्वय -

स्निग्धभोजिनां बलिनां हि व्यायामः सदा पथ्यः (अस्ति)। शीते च वसन्ते च सः तेषां पथ्यतमः स्मृतः।

जो लोग स्निग्ध पदार्थों का भोजन करते हैं, बलवान होते हैं उनके लिए तो व्यायाम हमेशा फायदेमंद है।  ठंडी में और वसंत ऋतु में वह (यानी व्यायाम) उनके लिए  सबसे ज्यादा फायदेमंद माना गया है।


स्निग्धभोजी यानी स्निग्ध पदार्थों का भोजन करने वाला।
स्निग्धभोजिनः - स्निग्ध भोजन करने वाले। यह बहुवचन है।
स्निग्धभोजीनाम् स्निग्ध भोजन करने वालों का। यह षष्ठी बहुवचन है।
स्निग्ध पदार्थ यानी घी, मख्खन, तेल, चर्बी (Fat) इत्यादि चिकनाई वाले पदार्थ। इन पदार्थों में सबसे ज्यादा ऊर्जा होती है।  और यदि हम ऐसे स्निग्ध पदार्थ खाते हैं तो हमारे शरीर में उस ऊर्जा की खपत होने भी जरूरी है।  और उस ऊर्जा की खपत के लिए व्यायाम करना बहुत जरूरी होता है।

स्निग्धभोजिनाम् बलिनाम् - इन दो शब्दों को हम अलग-अलग दृष्टि से देख सकते हैं।  यदि हमने स्निग्धभोजिनाम्  इस शब्द को बलिनाम्  इस शब्द का विशेषण समझा, तो स्निग्धभोजिनाम् बलिनाम्  इसका अर्थ हो जाएगा -  स्निग्ध भोजन करने वाले बलवान लोग।  अब श्लोक के  पहले वाक्य का अर्थ होगा -  स्निग्ध भोजन करने वाले बलवान  लोगों के लिए व्यायाम हमेशा फायदेमंद होता है।

इन्हीं दो शब्दों को  यदि अलग-अलग स्वतंत्र पर माना जाए तो  स्निग्ध भोजन करने वाले लोग और बलवान लोग ( इन दोनों के लिए)  व्यायाम फायदेमंद  होता है।  ऐसा भी अर्थ हो सकता है।

भावार्थ -

ये बलिनः जनाः स्निग्धं भोजनं कुर्वन्ति, तेषां कृते व्यायामः अत्यन्तं हितकरः भवति।  यतः व्यायामेन खादितं भोजनं सम्यक्तया पच्यते। व्यायामः शीतकाले वसन्तकाले च इतोऽपि लाभदायी भवति। अतः प्रतिदिनं व्यायामः करणीयः एव।

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व्याकरणम् -

·                     व्यायामो हि - व्यायामः + हि। इति उत्वसन्धिः।
·                     पथ्यो बलिनाम् - पथ्यः + बलिनाम्। इति उत्वसन्धिः।
·                     बलिनाम्
o                  बल + इन् - बलिन्। इति इन्-प्रत्ययः।
o                  बलिन् + आम् - बलिनाम्। इति षष्ठी बहुवचनम्।
·                     स च - सः च। इति विसर्गलोपसन्धिः।
·                     स्मृतः - स्मृ + क्त। इति क्तप्रत्ययः।


लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए सबसे जरुरी है ये भोजन
व्यायाम करने वाला कुछ भी हजम कर लेता है।The most important of these food is for a long and healthy life ...

सप्तमः श्लोकः 

व्यायामं कुर्वतो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम्।
विदग्धमविदग्धं वा निर्दोषं परिपच्यते॥७॥

शब्दार्थ - 

·                     व्यायामम् - कसरत
·                     कुर्वतः - करने वाले का
·                     नित्यम् - सदा। सदैव। हमेशा
·                     विरुद्धम् - विपरीतम्। उलटा
·                     अपि - भी
·                     भोजनम् - खाना
·                     विदग्धम् - पक्वम्। पका हुया
·                     अविदग्धम् - अपक्वम्। जो पका हुआ नहीं है
·                     वा - अथवा। या
·                     निर्दोषम् - बिना किसी परेशानी/गडबडी के,
·                     परिपच्यते - हजम हो जाता है

अन्वय - 

नित्यं व्यायामं कुर्वतः विरुद्धम् अपि भोजनम् , विदग्धम् अविदग्धं वा, निर्दोषं परिपच्यते।

हमेशा व्यायाम करनेवाले का विरुद्ध भी भोजन, पका हो या ना हो, बिना किसी गडबडी के पच जाता है।


इस श्लोक में विरुद्ध भोजन यह एक बात कही है। यहाँ विरुद्ध का अर्थ है ऋतु या काल  के विरुद्ध। यदि व्यायाम करने वाला ऋतु या समय के हिसाब उलटा भी अगर कुछ  खा ले, वह कच्चा हो या पका हुआ, उसकी अन्नपचन की शक्ति इतनी मजबूत रहती है कि वह खाया हुआ सबकुछ पच जाता है।
जैसे कि हम जानते हैं - गर्मी के समय में हमें ठंडी चीजें खानी चाहिए। जैसे कि शीतपेय, पानीदार फल। और गर्मी के मौसम में यदि हम उष्णता से भरपूर चीजें खा लेते हैं, तो परेशानी होती है। परन्तु व्यायाम करने वाला गर्मी में भी उष्ण चीजे खा सकता है और सर्दी में भी ठंडी चीजे खा सकता है।

 भावार्थ - 

ये जनाः नित्यं व्यायामं कुर्वन्ति ते यदि ऋतु-कालादिभिः विरुद्धम् अपि भोजनं कुर्वन्ति, तर्हि अपि तत् अन्नं पच्यते। तेषां भोजनं यदि पक्वम् वा अपक्वम् वा अपि भवेत्, तत् भोजनम् अपि पच्यते। अतः सर्वैः व्यायामः करणीयः।

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व्याकरण - 

·                     कुर्वतः 
o                  कृ + शतृ - कुर्वत्। इति शतृप्रत्ययः। करोति - करता है। कुर्वत् - करने वाला।
o                  कुर्वत् + अः - कुर्वतः। इति षष्ठीविभक्तिः। करने वाले का।
·                      अविदग्धम् - न विदग्धम्। इति नञ् - तत्पुरुषः।
·                     निर्दोषम् - दोषस्य / दोषाणाम् अभावः। इति अव्ययीभावसमासः।
·                     पच्यते - पच् + कर्मवाच्य।





जैसे गरुड के पास साँप नहीं आते, वैसे ही व्यायामी के पास रोग नहीं आते।

षष्ठः श्लोकः

व्यायामस्विन्नगात्रस्य पद्भ्यामुद्वर्तितस्य च,
व्याधयो नोपसर्पन्ति वैनतेयम् इव उरगाः।
वयोरूपगुणैर्हीनमपि कुर्यात्सुदर्शनम्॥६॥

शब्दार्थ -

·                     व्यायामस्विनगात्रस्य - जिसके अंग व्यायाम से गीले हो चुके हैं उस के, व्यायाम से परीनोपसीन हो जाने वाले के
o                  व्यायामः - कसरत
o                  स्विन्न - पसीने से लदबद
o                  गात्रम् - शारीरिक अंग
·                     पद्भ्याम् - (दो) पैरों से
·                     उद्वर्तितस्य - ऊपर उठकर किए जाने वाले (व्यायाम) करने वाले के
·                     च - और
·                     व्याधयः - रोगाः। बीमारियाँ
·                     न - नहीं
·                     उपसर्पन्ति - पास आती हैं
·                     वैनतेयम् - गरुड के
·                     इव - जैसे
·                     उरगाः - सर्पाः। साँप
·                     वयोरूपगुणैः - उम्र, रूप, गुण इत्यादि से
o                  वयः - आयुः। उम्र
·                     हीनम् - गरीब, जिसके पास ..... नहीं है
·                     अपि - भी
·                     सुदर्शनम् - सुन्दर
·                     कुर्यात् - कर लें

अन्वय - 

व्यायामस्विन्नगात्रस्य पद्भाम् उद्वर्तितस्य च (मनुष्यस्य समीपम्) वैनतेयम् इव उरगाः व्याधयः न उपसर्पन्ति। (व्यायामः) वयोरूपगुणैः हीनं (मनुष्यम्) अपि सुदर्शनं कुर्यात्।

व्यायाम से जो पसीनोपसीन हो जाता है और पैरों से ऊपर उठने वाले व्यायाम करने वाले मनुष्य के पास गरुड के जैसे साप (पास नहीं आते वैसे ही) बीमारियाँ पास नहीं आती। व्यायाम तो उम्र, सुन्दर रूप, अच्छे गुण इत्यादि से हीन मनुष्य को भी सुन्दर बना देगा।


पैरों से ऊपर उठने वाले व्यायाम यानी उठक बैठक, नीचे बैठकर उपर छलांग लगाना वगैरह जैसे व्यायाम। और ऐसे व्यायाम करने से जिसके गात्र (शरीर के अंग) स्विन्न (पसीने से लदबद) हो जाते हैं उसके पास बीमारियाँ नहीं आती, जैसे कि किसी गरुड के पास साँप नहीं आते। जो मनुष्य उम्र दराज है, यानी जिसकी उम्र ज्यादा है, जिसका रूप अच्छा नहीं है, अच्छे जिसके पास गुण भी नहीं हैं, वह मनुष्य व्यायाम करने से सुदर्शन ( सुन्दर) बन सकता है।
यह श्लोक अनुष्टुप् छन्द का है। हमने आजतक अनुष्टुप् छन्द के श्लोकों में प्रायः दो पंक्तियाँ ही देखी हैं। परन्तु कभी कभी तीन पंक्तियाँ भी हो सकती हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि कश्यप के दो पत्नियाँ  थी - विनता और कद्रू। गरुड विनता का पुत्र था इसीलिए उसका नाम वैनतेय पड गया। वैनतेय अर्थात् विनता का पुत्र।

भावार्थ - 

यथा गरुडस्य समीपं सर्पाः न आगच्छन्ति तथा यस्य मनुष्यस्य शरीरं प्रतिदिनं व्यायामेन स्वेदयुक्तं भवति, यः प्रतिदिनं पद्भ्यां उद्वर्तिव्यायामं  करोति तस्य मनुष्यस्य समीपं रोगाः न आगच्छन्ति। येषां वयः अधिकं, रूपं तथा गुणाः न सन्ति तान् जनान् व्यायामः सुन्दरतां ददाति।

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व्याकरण -

·                     व्यायामस्विन्नगात्रस्य -
o                  व्यायामेन स्विन्नम् - व्यायामस्विन्नम्। इति तृतीया तत्पुरुषः। व्यायाम से पसीनो पसीन।
o                  व्यायामस्विन्नम् गात्रं यस्य सः - व्यायामस्विन्नगात्रः। इति बहुव्रीहिः। व्यायाम से पसीनो पसीन अंग जिसका वह।
o                  व्यायामस्विन्नगात्रः तस्य - व्यायामस्विन्नगात्रस्य। इति षष्ठी विभक्तिः।
·                     व्याधयो न - व्याधयः + न। इति उत्वसन्धिः।
·                     नोपसर्पन्ति - न + उपसर्पन्ति। इत गुणसन्धिः।
·                     वयोरूपगुणैः 
o                   वयः च रूपं च गुणः च - वयोरूपगुणाः। इति इतरेतरद्वन्द्वः।
§                तैः - वयोरूपगुणैः । इति तृतीया विभक्तिः।
o                  वयसा च रूपेण च गुणेन च - वयोरूपगुणैः। इति इतरेत5रद्वन्द्वः।
·                     वयोरूपगुणैर्हीनम् - वयोरूपगुणैः + हीनम्। इति रुत्वसन्धिः।
ink drawing  imitation in vector. vintage style seamless vector pattern  with fantasy blooms and beautiful hands holding snakes ink drawing  imitation in vector. vintage style seamless vector pattern  with fantasy blooms and beautiful hands holding snakes कुंडली मे सांप ओर गरुड़ वर्ग का ...
Symbolic Image

बुढापे से कैसे बचे। च्वि प्रत्यय।
पञ्चमः श्लोकः

न चैनं सहसाक्रम्य जरा समधिरोहति।
स्थिरीभवति मांसं च व्यायामाभिरतस्य च॥५॥

·                     न - नहीं
·                     च - और
·                     एनम् - उसे (यहाँ अर्थ है - उस पर)
·                     सहसा - अकस्मात्, झटितिअचानक से
·                     आक्रम्य - हमला करके
·                     जरा - वृद्धत्वम्बुढापा
·                     समधिरोहति - आरोहतिचढता है 
·                     स्थिरीभवति - स्थिर होता है।
·                     मांसम् - आमिषम्मांस
·                     च - और
·                     व्यायामाभिरतस्य - व्यायाम में लगे हुए/ मश्गुल/ रत / मग्न मनुष्य का
o                  अभिरत - तल्लीन, रत, मग्न
अन्वय -

जरा च एनं (व्यायामिनं) सहसा आक्रम्य न समधिरोहति। व्यायामाभिरतस्य च मांसं स्थिरीभवति।

बुढापा उस व्यायाम करने वाले को अचानक से आक्रमण करके नहीं आता। और व्यायाम में रत मनुष्य का मांस स्थिर होता है।

एस श्लोक के अन्वय में - व्यायामिनम् यह एक शब्द है। जो कि मूल श्लोक में नहीं है। उसे अगर हम अन्वय से हटाकर केवल - जरा च एनं सहसा आक्रम्य....... ऐसा यदि लिखते हैं, तो अर्थ होता है - बुढापा उस को अचानक नहीं आता। अब यहाँ उस को यानी किस को? यह सवाल खडा होता है। इसीलिए पहले वाले श्लोक से व्यायामिनम् इस शब्द को उठाकर यहाँ ले आएं हैं। अब यह शब्द लिखने के बाद अर्थ होता है - बुढापा उस व्यायाम करने वाले को अचानक से नहीं आता। इसे अनुवृत्ति कहते हैं। यानी पिछले श्लोक से किसी शब्द को लेकर आना।
पिछले श्लोक में कहा गया है कि व्यायाम करने वाले को उसके शत्रु पीडा नहीं देते। और अब इस श्लोक में कहा गया है कि उस को (यानी उस व्यायाम करने वाले को) जल्दी बुढापा नहीं चढ जाता है।
श्लोक के दूसरे वाक्य में है कि व्यायाम-अभिरत मनुष्य का मांस स्थिर होता है। अब मांस स्थिर होने से तात्पर्य है कि जो लोग व्यायाम नहीं करते हैं, उनका मांस शरीर पर लटकने लगता है। अर्थात् उसमें मेद (यानी चर्बी) जमने लगती है। और यदि कोई व्यक्ति व्यायाम करने लगती है, तो शरीर में जमा मेद (चर्बी) कम होने लगती है। और हमारा मांस स्थिर होता है।
दूरसी पंक्ति में स्थिरीभवति यह एक शब्द है।
इस शब्द पर हमे विचार करना चाहिए। जैसे कि हमने अंग्रेजी में सुना है -

·                     western - westernisation
·                     computer - computerisation
·                     general - generalisation
इन शब्दों का संस्कृत रूप ऐसे होगा।

·                     पश्चिम - पश्चिमीकरण
·                     संगणक - संगणकीकरण
·                     सामान्य - सामान्यीकरण
ये एक प्रत्यय से बने हैं, जिसका नाम है - च्वि। अब यह च्वि प्रत्यय जब भी किसी शब्द को लगता है, तो उसका सर्वापहार लोप होता है। यानी यह प्रत्यय पूरा का पूरा लुप्त हो जाता है। यानी च्वि पूरा गायब होता है। परन्तु गायब होते समय वह पूर्वशब्द को ईकारान्त बना देता है। जसै - स्थिरी, पश्चिमी, संगणकी, सामान्यी।
और उसके बाद भू, कृ अथवा अस् धातू के रूप लगाकर शब्द बनते हैं।


परीक्षा की दृष्टि से इस श्लोक पर आधारित प्रश्नोत्तरों का अभ्यास करने लिए इस कड़ी पर जाएं -

  भावार्थः 

वयं सर्वे जानीमः यत् कालक्रमेण मनुष्यस्य शरीरं वृद्धत्वेन जराजर्जरं भवति। परन्तु यदि मनुष्य व्यायामं करोति तर्हि सहसा जरा आक्रमणं न करोति। व्यायामी मनुष्यस्य मांसं स्थिरं भवति। जराकारणेन शिथिलत्वं न आगच्छति।

भावार्थस्य हिन्द्यर्थः 

हम सब जानते हैं कि कालक्रम से मनुष्य का शरीर बुढापे से जराजर्जर होता है। परन्तु यदि मनुष्य व्यायाम करता है तो अचानक से बुढापा आक्रमण नही करता है। व्यायाम करने वाले व्यक्ति का मांस स्थिर होता है। बुढापे से शिथिलता नहीं आती है।

व्याकरण - 

·                     चैनम् - च + एनम्। इति वृद्धिसन्धिः।
·                     सहसाक्रम्य - सहसा + आक्रम्य। इति दीर्घसन्धिः।
o                  आक्रम्य - आ + क्रम् + ल्यप्
·                     व्यायामाभिरतस्य
o                  व्यायाम + अभिरतस्य। इति दीर्घसन्धिः।
o                  व्यायामे अभिरतस्य। इति सप्तमीतत्पुरुषसमासः।

व्यायाम से मोटापा कम होता है। व्यायाम करने वले को दुश्मन तकलीफ नहीं देते।

. व्यायामः सर्वदा पथ्यः।

कक्षा दशमी। शेमुषी।

चतुर्थः श्लोकः -

न चास्ति सदृशं तेन किञ्चित्स्थौल्यापकर्षणम्।
न च व्यायामिनं मर्त्यमर्दयन्तरयो बलात्॥४॥

शब्दार्थ - 

·                     न - नहीं
·                     च - और
·                     अस्ति - है
·                     सदृशम् - समानम्जैसा
·                     तेन - उसके
·                     किञ्चित् - कुछ भी
·                     स्थौल्य - स्थूलतामोटापा
·                     अपकर्षणम् - न्यूनीकरणम्कम करने वाला
·                     न - नहीं
·                     च - और
·                     व्यायामिनम् - व्यायाम करने वाले को
·                     मर्त्यम् - मनुष्यः, जनः, इस मृत्युलोक (पृथ्वी) में रहने वाला
·                     अर्दयन्ति - नाशयन्ति, मारयन्तिमारते हैं
·                     अरयः - शत्रवः, रिपवः, वैरिणःदुश्मन
·                     बलात् - हठात् , बलप्रयोगात्, बलपूर्वकम्जबर्दस्ती से

 अन्वय - 

तेन (व्यायामेन) सदृशं च स्थौल्यापकर्षणं किञ्चित् (अपि) नास्ति। अरयः च व्यायामिनं मर्त्यं बलात् न अर्दयन्ति।

और उस व्यायाम के समान मोटापे को कम करने वाला कुछ भी नहीं है। और शत्रु भी व्यायाम करने वाले मनुष्य को जबर्दस्ती से नहीं मारते हैं।


इस श्लोक में तेन यह सर्वनाम व्यायाम के लिए प्रयुक्त किया है। परन्तु उस पंक्ति में व्यायाम शब्द नहीं है। हाँ अगली पंक्ति में व्यायामिनम् यह शब्द है। परन्तु वह - तेन इस शब्द से संबन्धित नहीं है। तो फिस यहाँ तेन का संबंध व्यायाम से कैसे बन सकता है? इसका उत्तर है - अनुवृत्ति
अनुवृत्ति का मतलब है - पिछले श्लोकों से किसी शब्द को लेकर आना। पिछले दो श्लोक, दूसरा और तीसरा, व्यायाम के लाभ के बारे में बताते हैं। और यह तुरंत आनेवाला चतुर्थ श्लोक है। अतः हम पिछले श्लोक का संदर्भ लेकर कह सकते हैं कि यहाँ तेन यह सर्वनाम व्यायाम के लिए प्रयुक्त है। इसी कारण से इस श्लोक का जो अन्वय किया गया है, उस में - तेन (व्यायामेन) ऐस कंस में तेन के बाद व्यायामेन यह शब्द लिखा है।
श्लोक में अरयः यह एक शब्द लिखा है। जिसका मूल शब्द है - अरि। यानी दुश्मन। और अरयः यह उस शब्द का बहुवचन रूप है। अरिः - एक दुश्मन। अरयः - बहुत सारे दुश्मन। यदि परीक्षा में अरयः इस शब्द का समानार्थी शब्द पूछा जाएं तो उत्तर भी बहुवचनी ही लिखना है। जैसे की अरिः का अर्थ है दुश्मन, और शत्रुः इस शब्द का भी अर्थ है दुश्मन। परन्तु अरयः का समानार्थी शत्रुः नहीं होगा। क्योंकि अरयः यानी बहुत सारे दुश्मन और शत्रुः यानी एक दुश्मन। अतः हमें शत्रुः का बहुवचन शत्रवः ऐसा लिखना होगा।
भावार्थ - 
व्यायाम इव शरीरस्य स्थूलतां न्यूनीकर्तुम् अन्यं किमपि नास्ति। अतः यः मनुष्यः व्यायामं करोति तस्य शत्रुजनाः अपि तं मनुष्यं बलपूर्वकं न पीडयन्ति। अर्थात् तस्मै व्यायामिमनुष्याय कष्टं यच्छन्ति।

इस श्लोक पर आधारित प्रश्न - उत्तरोंका अभ्यास करने के लिए इस कडी पर जाएं।

व्याकरण - 

·                     चास्ति - च + अस्ति। इति सवर्णदीर्घसन्धिः।
·                     स्थौल्यापकर्षणम् -
o                   स्थौल्य + अपकर्षणम्। इति सवर्णदीर्घसन्धिः।
o                  स्थौल्यस्य अपकर्षणम्। इति षष्ठीतत्पुरुषः।
·                     व्यायामिनम् 
o                   व्यायाम + इन् - व्यायामिन्। इति प्रत्ययः।
o                  व्यायामिन् + द्वितीया - व्यायामिनम्। इति विभक्तिः।
·                     मर्त्यमर्दयन्ति - मर्त्यम् + अर्दयन्ति। इति संयोगः। अत्र सन्धिः नास्ति।
·                     अर्दयन्त्यरयः - अर्दयन्ति + अरयः। इति यण्सन्धिः।
·                     अरयो बलात् - अरयः + बलात्। इत उत्वसन्धिः।

द्वितीय और तृतीय श्लोकों का परीक्षा की दृष्टि से एकत्रित अभ्यास।

पाठ ३. व्यायामः सर्वदा पथ्यः।

कक्षा दशमी। शेमुषी।

द्वितीयतृतीयौ श्लोकौ

इन दोनों श्लोकों को एकत्रित कर लेने से ही ठीक ठीक अर्थ समझ में आता है। अतः हो सकता है कि परीक्षा में दोनों श्लोक एकत्रित ही पूछे जाए। इसीलिए दोनों श्लोकों का पृथक् पृथक् अध्ययन करने के बाद अब दोनों को एक साथ भी पढना आवश्यक है। 

शरीरोपचयः कान्तिर्गात्राणां सुविभक्ततता।
दीप्ताग्नित्वमनालस्यं स्थिरत्वं लाघवं मृजा॥२॥
श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनां सहिष्णुता।
आरोग्यं चापि परमं व्यायामादुपजायते॥३॥

अन्वय - 

व्यायामात् शरीरोपचयः, कान्तिः, गात्राणां सुविभक्तता, दीप्ताग्नित्वम्, अनालस्यं, स्थिरत्वं, लाघवं, मृजा, श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनां सहिष्णुता अपि च परमम् आरोग्यम् उपजायते।
व्यायाम से शरीर की वृद्धि, तेज, शारीरिक अंगों की सुडौलता, जठराग्नि की प्रबलता, फुर्ती, स्थिरता, हल्कापन, स्वच्छता, परिश्रम-थकान-प्यास-गर्मी-ठंडी इत्यादि को सहने की क्षमता और अच्छी सेहत उत्पन्न होती है।

भावार्थ - 

प्रतिदिनं व्यायामः करणीयः। यदि कश्चन जनः प्रतिदिनं व्यायामं करोति तर्हि तस्य शरीरे वृद्धिः भवति, शरीरस्य तेजः वर्धते, तस्य अङ्गानि सुविभक्तानि भवन्ति। तस्य जनस्य उदरे जठराग्निः प्रदीप्तः भवति। तस्य शरीरे आलस्यं न प्रभवति। स्थैर्यं भवति। उत्साहः वर्धते। शरीरं स्वच्छं भवति। अपि च परिश्रमः, श्रान्तिः, तृष्णा, उष्णता, शीतलता च इत्यादीनां कारणेन या पीडा भवति तां पीडाम् अपि व्यायामी जनः सहते।  एवम् अनेन प्रकारेण तस्य जनस्य आरोग्यं भवति।

व्यायाम से सहिष्णुता (सहनशीलता) और आरोग्य की प्राप्ति।

पाठ ३. व्यायामः सर्वदा पथ्यः।

कक्षा दशमी। शेमुषी।

तृतीयः श्लोकः

श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनां सहिष्णुता।
आरोग्यं चापि परमं व्यायामादुपजायते॥३॥

शब्दार्थ - 

·                     श्रम - परिश्रम, मेहनत
·                     क्लम - थकान
·                     पिपासा - तृष्णा, प्यास
·                     उष्ण - गर्मी
·                     शीत - ठंड
·                     आदीनाम् - इन सभी की
·                     सहिष्णुता - सहनशक्ति, सहने की क्षमता
·                     आरोग्यम् - नीरोगता, हेल्थ
·                     च - और
·                     अपि - भी
·                     परमम् - उत्तम, श्रेष्ठ
·                     व्यायामात् - व्यायाम से
·                     उपजायते - उत्पन्न होते हैं
अन्वय - 

व्यायामात् श्रम-क्लम-पिपासा-उष्ण-शीत-आदीनां सहिष्णुता अपि च परमं आरोग्यम् उपजायते।

व्यायाम से परिश्रम, थकान, प्यास, गर्मी, ठंडक आदि को सहन करने की क्षमता और भी उत्तम आरोग्य उत्पन्न होता है।


इस श्लोक में दो बातों का जिक्र किया गया है। एक है सहिष्णुता और दूसरी बात है आरोग्य।
सहिष्णुता यानी सहनशीलता। हमरे जीवन में थकान, प्यास, ठंडी, गर्मी जैसी अनेको विपरीत परिस्थितियाँ आती हैं। उनको सहने की शक्ति हमें व्यायाम से मिलती है।
और दूसरी बात है आरोग्य। यह शब्द बना अरोग इस शब्द से। अरोग यानी रोग ना होना। और आरोग्य यानी रोग ना होनी की स्थिति। यानी व्यायाम करने से हम कुछ ऐसी परिस्थिति में आ जाते हैं कि हमें रोग होते ही नहीं। अब इसके लिए समानार्थी शब्द है नीरोगता। इस नीरोगता शब्द के बारे में हमेशा ध्यान रहे कि नी का इकार हमेशा दीर्घ ही रहे। इसे निरोगता ऐसे नहीं लिखते। क्यों की यहाँ विसर्ग सन्धि है। निः+रोग - नीरोग। और नीरोग शब्द से तल् प्रत्यय से नीरोगता यह शब्द सिद्ध हुआ है। 

भावार्थ - 

यः मनुष्यः प्रतिदिनं व्यायामं करोति सः परिश्रमः, श्रान्तिः, तृष्णा, उष्णता, शीतलता च इत्यादीनां सहनं कर्तुं शक्नोति। तथैव व्यायामी मनुष्यः उत्तमम् आरोग्यम् अपि प्राप्नोति।

भावार्थस्य हिन्द्यर्थः -

 जो मनुष्य हररोज व्यायाम करता है वह मेहनत, थकान, प्यास, गर्मी और ठंडी इत्यादि का सहन कर सकता है। और व्यायम करने वाला मनुष्य अच्छा आरोग्य भी पाता है।

व्याकरणम् - 
·                     श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनाम्
o                  श्रमः च क्लमः च पिपासा च उष्णं च शीतं च - श्रमक्लमपिपासोष्णशीतानि। इति इतरेतरद्वन्द्वः।
o                  श्रमक्लमपिपासोष्णशीतानि आदीनि येषां ते - श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादयः। इति बहुव्रीहिः समासः।
o                  श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादयः। तेषां श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनाम्। इति षष्ठी विभक्तिः।
o                  पिपासोष्ण - पिपासा + उष्ण। इति गुणसन्धिः।
o                  शीतादीनाम् - शीत + आदीनाम् । इति दीर्घसन्धिः।
·                     सहिष्णुता - सहिष्णु + तल्। इति प्रत्ययः।
·                     चापि - च + अपि। इति दीर्घसन्धिः।
·                     व्यायामादुपजायते - व्यायामात् + उपजायते। इत जश्त्वसन्धिः। कचटतप - गजडदब।

व्यायाम के लाभ। जठराग्नि। लाघवचिह्न।

पाठ ३. व्यायामः सर्वदा पथ्यः।

द्वितीयः श्लोकः। कक्षा दशमी।

शरीरोपचयः कान्तिर्गात्राणां सुविभक्तता।
दीप्ताग्नित्वमनालस्यं स्थिरत्वं लाघवं मृजा॥२॥

शब्दार्थ - 

·                     शरीर - देह, काया
·                     उपचय - वृद्धि होना, समृद्ध होना, इकठ्ठा होना
·                     कान्तिः - दीप्ति, चमक
·                     गात्राणाम् - गात्रों की(गात्र - शरीर के अंग, अवयव)
·                     सुविभक्तता -  सौष्ठव, उत्तमता, सुडौल होना, समान रूप से विकास
·                     दीप्ताग्नित्वम् - अग्नि का प्रज्वलित होना, जठराग्नि का प्रज्वलित रहना, अच्छी भूख लगना
·                     अनालस्यम् - आलस ना होना, फूर्तीला होना
·                     स्थिरत्वम् - स्थिरता, विकृति का ना होना
·                     लाघवम् - हल्कापन, लचीलापन
·                     मृजा - स्वच्छता, नीरोगता, वात कफ पित्त इत्यादि का संतुलन
अन्वय - 

(व्यायामात्)  शरीरोपचयः कान्तिः गात्राणां सुविभक्तता दीप्ताग्नित्वम् अनालस्यं स्थिरत्वं लाघवं मृजा (च उपजायते)

व्यायाम से शरीर की वृद्धि, चमक, शारीरिक अंगों की सुडोलता, जठराग्नि की प्रबलता, आलस का अभाव (यानी फुर्तीलापन), स्थिरता (कोई विकृति ना होना), हल्कापन और नीरोगता (मनुष्य को) प्राप्त होते हैं।


वैसे अगर देखा जाए तो इस श्लोक में केवल शरीरोपच, कान्ति वगैरह गुणों के नाम ही हैं। ये गुण कैसे मिलते हैं या नहीं मिलते हैं अथवा इन नामों से हमें क्या समझना है इत्यादि के बारे में कोई जानकारी प्रस्तुत श्लोक में नहीं है। इस के बाद वाला श्लोक यदि हम पढेगे तब हम पूरी संगति लग जाती है। इस श्लोक के अन्वय में दो शब्द कंस में लिखे हैं - व्यायामात् और उपजायते। ये शब्द भी अगले वाले श्लोक से हैं। अगले श्लोक में और भी कुछ ऐसे ही शरीरोपचयः कान्ति इत्यादि जैसे अन्य गुण बताकर अन्त में बताया है कि ये सब व्यायाम से उत्पन्न होते हैं। तब जा कर हमें पूरी संगति लग जाती है। तो इस अर्थ से देखा जाए तो यह श्लोक अपूर्ण है।
यानी दोनों श्लोकों को एकसाथ पढना पडता है।
दीप्ताग्नित्वम् - दीप्त यानी प्रज्वलित, प्रकाशमान। और अग्नि यानी आग। तथा दीप्ताग्नित्वम् यानि आग का जलना। अब इस कविता में किस आग को शरीर में जलाया जा रहा है? यह प्रश्न उठता है।
इसका उत्तर बहुत आसाना है। यह अग्नि है - जठराग्नि। यहां जठर इस शब्द का अर्थ है पेट। पेट में वैसे देखा जाए तो कोई आग तो नहीं होती है। परन्तु कुछ ऐसे रसायन होते हैं जिनका परिणाम उष्ण (गर्म) होता है। और इन में प्रमुख रसायन है HCl - हायड्रोक्लोरिक आम्ल। यह जठराग्नि इतनी होती है कि यदि उसे किसी लोहे जैसे धातु पर भी गिराया जाएं तो उसे भी यह पिघला सकती है। परन्तु इसके बावजूद भी यह हमारे पेट में सुरक्षित होती है।
यह जठराग्नि ही हमें भूखे होने का अहसास दिलाती है। यदि जठराग्नि कमजोर पड जाए तो हमें भूख कम लगती है और स्वास्थ्य खराब होता है।
इस जठराग्नि के लिए ही हमें हमेशा वैद्य लोगों से सलाह मिलती रहती है कि भोजन के बाद पानी नहीं पीना चाहिए। क्योंकि भोजन को हजम करने के लिए उष्णता की आवश्यकता होती है। जठराग्नि के प्रदीप्त होने की आवश्यकता होती है। परन्तु हम भोजन के बाद एक प्याला पानी तो पीते ही हैं।  (आजकल तो ठंडा फ्रिज का पानी पिया जाता है। वह तो साक्षात् जहर ही है।) इससे जठर की अग्नि ठंडी पड जाती है।

लाघवम् - वैसे अगर देखा जाए तो लाघव इस शब्द का अर्थ है - छोटा होना। यह शब्द लघु इस शब्द से बना है। लघु का अर्थ होता है छोटा। इसका विरुद्धार्थी शब्द हौ गौरव (बडप्पन)। गुरु - गौरव। लघु - लाघव।
यहाँ इस श्लोक में लाघव का अर्थ हल्कापन यह हो सकता है।
एक लाघवचिह्न नाम का चिह्न भी प्रसिद्ध है जो कुछ इस प्रकार दिखता है - ॰। यह लाघवचिह्न किसी भी नाम वगैरह का संक्षिप्त रूप (Short Form) लिखने के लिए प्रयुक्त होता है। जैसे कि किसी का नाम - श्री॰ मुकेशचन्द्र। यहाँ श्री॰ का अर्थ है श्रीमान्। परन्तु उसे संक्षेप से लिखने हेतु ॰ इस लाघव चिह्न का प्रयोग होता है। अब इस चिह्न की परेशानी यह है कि यह कुंजीपटल (keyboard) पर कहाँ होता है यह बाता ज्यादातर लोग नहीं जानते अतः इसके स्थान पर अंग्रेजी पूर्णविराम, यानी - . इस चिह्न को ही लिख देते हैं। जैसे - श्री. मुकेशचन्द्र। परन्तु इन दोनों चिह्नों में अन्तर हैं। और तो और कुछ लोग इस लाघवचिह्न को शून्य समझकर इसके स्थान पर शून्य का भी प्रयोग कर देते हैं। जैसे - श्री० मुकेशचन्द्र।
लाघवचिह्न - ॰
अंग्रेजी पूर्णविराम - .
अब प्रश्न है कि लाघवचिह्न कुंजीपटल पर कहाँ मिलता है? यदि आप इन्-स्क्रिप्ट कीबोर्ड पर टाईप कर रहे हैं तो AltGr + , (यानी दायी अल्ट और कॉमा एकसाथ) इस संयोग से लाघवचिह्न लिख सकते हैं।
अथवा इसका यूनिकोड संकेत भी है। किसी भी वर्ड प्रोसेसर में 0907 ऐसा लिखने के बाद Alt + X ऐसी कुंजियाँ दबाने से भी लाघवचिह्न लाया जा सकता है।
लाघवचिह्न के इस विवेचन से हमें बस इतना समझना है कि लाघव का अर्थ है छोटापन। परन्तु इस श्लोक में इसका अर्थ शरीर में हल्कापन हो सकता है।

भावार्थ - 

व्यायामेन शरीरस्य वृद्धिः भवति। शरीरं कान्तिमत् भवति। शरीरस्य सौष्ठवं च भवति। व्यायमकारणेन जठराग्निः प्रदीप्तः भवति। व्यायमेन शरीरे आलस्य न भवति। स्थैर्यं भवति। उत्साहः वर्धते। अपि च व्यायामकारणेन शरीरस्य नीरोगता अपि भवति। यदि मनु्ष्यः व्यायाम करोति तर्हि इत्यादः लाभाः भवन्ति।

भावर्थस्यहिन्द्यर्थः
व्यायाम से शरीर की वृद्धि होती है। शरीर चमकदार होता है। शरीर सुष्ठ होता है। व्यायाम के कारण से जठराग्नि प्रदीप्त होती है। व्यायाम से शरीर में आलस नहीं होता है। शरीर स्थिर होता है। उत्साह बढता है। और तो और व्यायाम से शरीर नीरोग होता है। यदि मनुष्य व्यायाम करता है तो ऐसे लाभ होते हैं।

व्याकरणम् - 

·                     शरीरोपचयः
o                  सन्धिः - शरीर + उपचयः। इति गुणसन्धिः।
o                  समासः - शरीरस्य उपचयः। इत षष्ठीतत्पुरुषः।
·                     कान्तिर्गात्राणाम् - कान्तिः + गात्राणाम्। इति रुत्वसन्धिः।
·                     सुविभक्तता -
o                   सुविभक्त + तल्। इति प्रकृतिप्रत्ययौ।
·                     दीप्ताग्नित्वम् 
o                  दीप्त + अग्नित्वम्। इति गुणसन्धिः।
o                  दीप्ताग्नि + त्व। इति प्रकृतिप्रत्ययौ।
·                     अनालस्यम् - न आलस्यम्। इति नञ्-तत्पुरुषः।
·                     स्थिरत्वम् - स्थिर + त्व। इति प्रकृतिप्रत्ययौ।



व्यायाम किसे कहते हैं। व्यायाम के बाद मालिश क्यों करनी चाहिए।

०३. व्यायामः सर्वदा पथ्यः।

प्रथमः श्लोकः। कक्षा दशमी।

इस श्लोक में व्यायाम की परिभाषा (डेफिनेशन) बताई गई है।

शरीरायासजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम्।
तत्कृत्वा तु सुखं देहं विमृद्नीयात् समन्ततः॥१॥

अधोलिखितम् श्लोकं पठित्वा उत्तरत –

शरीरायासजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम्।
तत्कृत्वा तु सुखं देहं विमृद्नीयात् समन्ततः॥१॥

प्रश्ना: (क) एकपदेन उत्तरत –
(I) किं कृत्वा सुखं प्राप्यते ?
(II) समन्तत:किम् विमृद्नीयात् ?
(III) शरीरायासजननं कर्म किं कथ्यते ?

प्रश्ना: (ख) पूर्णवाक्येन  उत्तरत –
(I) किदर्श कर्म व्यायामसंज्ञितम् ?
(II) व्यायामं कृत्वा किं प्राप्यते  ?

 प्रश्ना: (ग) भाषिक कार्यं –
(I) तत्कृत्वा तु सुखं अत्र ‘तत्’कस्मै प्रयुक्तं  ?
(II) “ शरीरम्” इति पदस्य पर्यायपदं श्लोकात् चित्वा लिखत ?
(III) शरीरायासजननं’ इत्यस्य  पदस्य किं विषेष्यपदं श्लोके प्रयुक्तं ?
(IV)’ दु:खम्’ इत्यस्य पदस्य विलोमपदं लिखत |

शब्दार्थः -
·                     शरीर - काया, देह
·                     आयास - श्रम, मेहनत
·                     जननम् - निर्मिति (यहाँ निर्मिति करने वाला)
·                     कर्म - काम
·                     व्यायामसंज्ञितम् - व्यायम इस नाम से जाना जाता है
·                     तत् - वह
·                     कृत्वा - कर के
·                     तु - तो
·                     सुखम् - सुख
·                     देहम् - शरीर को,
·                     विमृद्नीयात् - मालिश करनी चाहिए, रगड़ना चाहिए।
·                     समन्ततः - चारों ओर से

अन्वय

शरीरायासजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम्। तत् कृत्वा तु सुखं देहं समन्ततः विमृद्नीयात्।

शरीर का श्रम उत्पन्न करने वाला काम व्यायाम इस नाम से जाना जाता है। वह (व्यायाम) कर के तो आराम से शरीर की हर तरफ से मालिश करनी चाहिए।


इस श्लोक में व्यायम के बाद शरीर की मालिश करने को कहा गया है। अब प्रश्न उठता है कि व्यायाम के बाद ही क्यों? पहले क्यों नहीं?
देखिए मालिश होती है तेल जैसे पदार्थों से। और ऐसे तेल वगैरह लगा कर मालिश करने के पश्चात् यदि हम व्यायाम करने लगे तो सोचिए क्या होगा? व्यायाम की वजह से शरीर से स्वेद (पसीना) निकलने लगता है। और वह स्वेद तेल के साथ मिल कर चर्मरोग (खुजली, दाद इ॰) का कारण बन सकते हैं। इसीलिए व्यायम के बाद शरीर शान्त हो जाए, तब शान्ति से मालिश हो सकती है।

भावार्थ -

येन कर्मेण शरीरस्य परिश्रमः भवति, तत् कार्यं व्यायामः इति नाम्ना संज्ञितम् अस्ति। व्यायामात् अनन्तरं मनुष्येण सुखेन शरीरस्य मर्दनं करणीयम्।

भाव का हिन्द्यर्थ -

जिस काम से शरीर का परिश्रम होता है, वह कार्य व्यायाम इस नाम से जाना जाता है। व्यायाम के बाद मनुष्य ने इत्मिनान से शरीर की मालिश करनी चाहिए।


इस श्लोक पर आधारित प्रश्नोत्तरों का अभ्यास करने के लिए इस कड़ी पर जाएं।
https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSd60MaXRbE02rNwi-NcU1AEeD7Z88ZBBuXE-B04-CfXYrCgWA/viewform?usp=sf_link

व्याकरण -

·                     शरीरासायासजननम् - षष्ठी तत्पुरुष समासः। दीर्घसन्धिः।
o                  शरीरस्य आयसस्य जननम्।
o                  शरीर + आयस - जननम्।  यहाँ हम सवर्णदीर्घसन्धि कर सकते हैं।
o                  शरीरायस - जननम्।
o                  शरीसायसजननम्।
·                     व्यायामसंज्ञितम् - तृतीया तत्पुरुषः।
o                  संज्ञा - नाम।
o                  संज्ञित करना - नामकरण करना।
o                  व्यायामसंज्ञित - व्यायाम (इस नाम) से नामकृत।










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शिक्षण उद्देश्य
1.प्रस्तुत श्लोकों का अध्ययन करके छात्र व्यायाम का महत्व समझ सकेंगे।
2. शरीरसौष्ठव,स्फूर्ति,आरोग्य एवं सहिष्णुता आदि व्यायाम के लाभों का ज्ञान छात्रों को प्राप्त होगा।
3.व्यायाम हमेशा कल्याणकर होता है ,अतः हर रोजव्यायाम करना चाहिए यह भाव छात्रों में जागृत होगा।
4.नियमित रूप से व्यायाम करके छात्र स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करेंगे|