Tuesday, 25 August 2015

संस्कृत शिक्षकों के अंदर मानो संजीवनी डाल दी हो

संस्कृत की और छात्रों का ध्यान आकृष्ट हो रहा है केंद्रीय विद्यालय संगठन ने इस भाषा की और विशेष ध्यान दिया है इस वर्ष संस्कृत सप्ताह के माध्यम से बच्चों ने बहुत कुछ जाना है शिक्षकों का भी योगदान सराहनीय रहा है | विद्वानों के द्वारा सिखने का आसान तरीका तथा रोजगार के बारे में बताया गया विदशी भाषाओ के बदले संस्कृत को नहीं हटाना सबसे खुश खबरी वाला निर्णय ने संस्कृत शिक्षकों के अंदर मानो संजीवनी डाल दी हो |केंद्रीय विद्यालय सवाई माधोपुर में छात्र-छात्राओ ने संस्कृत को वैकल्पिक विषय के रूप में चुना है | हम भरसक प्रयासरत है | जयतु संस्कृतम प्रेषक -----किशन गोपाल मीना टी जी टी संस्कृत

समाज की एक कड़वी हक़ीक़त:- जिसके गवाह हम सब हैं, जिसके ज़िम्मेदार हम सब हैं।

समाज की एक कड़वी हक़ीक़त:-
जिसके गवाह हम सब हैं, जिसके ज़िम्मेदार हम सब हैं।
यह दर्दनाक घटना एक परिवार की है। जिसमें परिवार का मुखिया, उसकी पत्नी और दो बच्चे थे। जो जैसे तैसे अपना जीवन घसीट रहे थे।
घर का मुखिया एक लम्बे अरसे से बीमार था। जो जमा पूंजी थी वह डॉक्टरों की फ़ीस और दवाखानों पर लग चुकी थी। लेकिन वह अभी भी चारपाई से लगा हुआ था। और एक दिन इसी हालत में अपने बच्चों को अनाथ कर इस दुनिया से चला गया।
रिवाज़ के अनुसार तीन दिन तक पड़ोस से खाना आता रहा, पर चौथे दिन भी वह मुसीबत का मारा परिवार खाने के इन्तजार में रहा मगर लोग अपने काम धंधों में लग चुके थे, किसी ने भी इस घर की ओर ध्यान नहीं दिया।
बच्चे अक्सर बाहर निकलकर सामने वाले सफेद मकान की चिमनी से निकलने वाले धुएं को आस लगाए देखते रहते। नादान बच्चे समझ रहे थे कि उनके लिए खाना तैयार हो रहा है। जब भी कुछ क़दमों की आहट आती उन्हें लगता कोई खाने की थाली ले आ रहा है। मगर कभी भी उनके दरवाजे पर दस्तक न हुई।
माँ तो माँ होती है, उसने घर से रोटी के कुछ सूखे टुकड़े ढूंढ कर निकाले। इन टुकड़ों से बच्चों को जैसे तैसे बहला फुसला कर सुला दिया।
अगले दिन फिर भूख सामने खड़ी थी। घर में था ही क्या जिसे बेचा जाता, फिर भी काफी देर "खोज" के बाद चार चीज़ें निकल आईं। जिन्हें बेच कर शायद दो समय के भोजन की व्यवस्था हो गई। बाद में वह पैसा भी खत्म हो गया तो जान के लाले पड़ गए। भूख से तड़पते बच्चों का चेहरा माँ से देखा नहीं गया। सातवें दिन विधवा माँ ही बड़ी सी चादर में मुँह लपेट कर मुहल्ले की पास वाली दुकान पर जा खड़ी हुई।
दुकानदार से महिला ने उधार पर कुछ राशन माँगा तो दुकानदार ने साफ इंकार ही नहीं किया बल्कि दो चार बातें भी सुना दीं। उसे खाली हाथ ही घर लौटना पड़ा। एक तो बाप के मरने से अनाथ होने का दुख और ऊपर से लगातार भूख से तड़पने के कारण उसके सात साल के बेटे की हिम्मत जवाब दे गई और वह बुखार से पीड़ित होकर चारपाई पर पड़ गया। बेटे के लिए दवा कहाँ से लाती, खाने तक का तो ठिकाना था नहीं। तीनों घर के एक कोने में सिमटे पड़े थे। माँ बुखार से आग बने बेटे के सिर पर पानी की पट्टियां रख रही थी, जबकि पाँच साल की छोटी बहन अपने छोटे हाथों से भाई के पैर दबा रही थी। अचानक वह उठी, माँ के कान से मुँह लगा कर के बोली "माँ, भाई कब मरेगा???"
माँ के दिल पर तो मानो जैसे तीर चल गया, तड़प कर उसे छाती से लिपटा लिया और पूछा "मेरी बच्ची, तुम यह क्या कह रही हो?"
बच्ची मासूमियत से बोली,
"हाँ माँ ! भाई मरेगा तो लोग खाना देने आएँगे ना???"
कृपया अपनी दौलत को धर्म के नाम पर चढ़ावा चढ़ाने की बजाय किसी असहाय भूखे को खाना खिलाकर पुण्य प्राप्त करें।
इससे सारे जहाँ के मालिक भी खुश होंगे और आप को भी सूकून मिलेगा ।

इरादे पक्के

किसी को तकलीफ देना मेरी आदत नही,
बिन बुलाया मेहमान बनना मेरी आदत नही...!
मैं अपने गम में रहता हूँ नबाबों की तरह,
परायी खुशियो के पास जाना मेरी आदत नही...!
सबको हँसता ही देखना चाहता हूँ मै,
किसी को धोखे से भी रुलाना मेरी आदत नही...!
बांटना चाहता हूँ तो बस प्यार और मोहब्बत,
यूँ नफरत फैलाना मेरी आदत नही...!
जिंदगी मिट जाये किसी की खातिर गम नही,
कोई बद्दुआ दे मरने की यूँ जीना मेरी आदत नही...!
सबसे दोस्त की हैसियत से बोल लेता हूँ,
किसी का दिल दुखा दूँ मेरी आदत नही...!
दोस्ती होती है दिलों से चाहने पर,
जबरदस्ती दोस्ती करना मेरी आदत नही.

थोड़े गंभीर पल

यारों गम में भी मुसकराना पलकों पे जग को खुशी देना 
मजबूरी हकीकत कोई न समझे मेरे लबजो को राह देना |
कहना था राह दिखाना पर कांटे लबजो की दीवार बन सजे 
दिल में कभी खुदगरजी नहीं थी पर ही खुदगर्ज बन बैठे |
कभी सपने में दुख नहीं दिया पर लब्ज विष का घाव बन गए 
हम चलते फिरते दीवाने भावों के गहरे भँवर में फसते चले गए |
हम कभी गलत नहीं थे न कभी होंगे चाहे दुनिया सारी सोचे
पलकों पे बिठाने वाले कभी आसियाना तोड़ा नहीं करते|

विषय : सत्य और असत्य का निश्चय करने की कसौटियाँ।

विषय : सत्य और असत्य का निश्चय करने की कसौटियाँ। 
- सृष्टिक्रम - सृष्टि का यह नियम है कि जो उत्पन्न होता है वह समाप्त भी होता है क्योंकि वह संयोगजन्य है। जिसमें संयोग होता है उसमें वियोग भी निश्चित होगा। अतः जन्म-मृत्यु, दुःख-सुख ये सृष्टि में अनिवार्य है। ऐसा ही जानना, मानना सत्य है। ऐसा जानना, मानना कि सृष्टि जड़ है, ईश्वर ने इसे बनाया है। हमे यह केवल धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की सिद्धि हेतु उपयोग करने के लिए दी है अतः इसके अनुकूल ही आचरण करना। जो-जो नियम ईश्वर ने सृष्टि के लिए बनाए हैं उन्हीं नियमों का पालन करते हुए वैसा ही आचरण करना, यही सत्य है इसके विपरीत असत्य है।

धर्म सत्य की अनुभूति है,

धर्म सत्य की अनुभूति है, सभी धर्म अपने -२ ढंग से सत्य को खोजने का प्रयास करते है,धार्मिक पुरूष" नैतिक गुणों का पुंज"होता है नैतिक गुणों के अभाव में किसी भी व्यक्ति को
" धार्मिक नही कहां जा सकता है|
नैतिकता के अभाव में धर्म स्वयं, अधर्म ( ढोंग ,पाखंड,प्रदर्शन ,उंचनीच,अन्याय ,अत्याचार आदि) का प्रचारक बन जाता है,वर्तमान में अधिकतर ये ही हो रहा है|काल्पनिक कथाओ,किवदंतियों एवं करोडो देवी देवताओ के नाम पर आस्था के केन्द्रों को बिजनेस केन्द्रों में तब्दील कर रखा है|
नैतिकता ही धर्म और अधर्म की विभेदक है,
निहित स्वार्थ सिद्धि के लिए धर्म को लेकर तर्क का ताना बाना बुनना एक बहाना मात्र है,ताकि धर्म के नाम पर" अमानवीय वृतियों को खुलकर बढावा मिल सके|
सदियों से कुछ षडयंत्रकारी ऐसा जाल बुन करधर्म के नाम पर गरीबों का गला घोंट रहे है
आतंक और उन्माद को बढा रहे है, धर्म की दुहाई देने से अनैतिकता धर्म नही बन सकती|
स्वर्ण के पात्र को देखकर ही, यह समझना कि
उसमें अमृत है,बडी भूल है|
आज हम निम्न/ मध्यम वर्ग के लोग यही बडी भूल कर रहे है|
नैतिकता का प्रमुख केन्द्र बिन्दु मानव है, नैतिक व्यक्ति को यह विश्वास होता है कि उसे उन्ही कर्मों का फल भोगना है,जिनको उसने अपनी स्वतंत्र इच्छा से किया है|
कर्म- फल- भोग के लिए किसी भी व्यक्ति को विवश नही किया जा सकता है, मानव स्वयं कर्म का कर्ता और कर्म फल का प्रदाता है,वह स्वयं कर्म करता है और तदानुसार कर्म फल भोगता है|
ईश्वरअथवा कोई भी अति प्राकृतिक सत्ता कर्मफल सम्बन्ध में हस्तक्षेप नही करती है|
नैतिकता शुभ से सम्बन्धित है, शुभ ही मानव व्यक्तित्व केविकास में सहायक है, नैतिक गुण व्यक्ति में सामाजिकता की भावना पैदा करते है जो उसे स्वार्थ की परिधि से ऊपर उठाकर समाज कल्याण के लिए प्रेरित करते है|
नैतिकता कर्तव्य- अकर्तव्य,शुभ-अशुभ,पाप-पुण्य की विवेचना करती है,इस प्रकार नैतिकता मानव को सदाचरण की शिक्षा देती है तथा उसे प्रगति के मार्ग पर अग्रसर करती है|नैतिक मूल्यऔर सदाचरण ईश्वर के आदेशों पर निर्भर नही है, बिना ईश्वर को मानें भी व्यक्ति नैतिक हो सकता है| जैनऔर बौद्ध धर्म इसके उदाहरण है|
यदि भय और प्रलोभन से व्यक्ति नैतिक नही बन सकता,नैतिक आचरण तो स्वतंत्र इच्छा शक्ति से प्ररित होता है|
प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्शे ने कहां है कि नैतिकता धर्म के बिना भी संभव है,एक व्यक्ति बिना धर्म के भी चरित्रवान हो सकता है तथा धार्मिक मठाधीश अनैतिक आचरण से जेल में है|
नैतिकता धर्म पर निर्भर न होकर आत्मनिर्भर है नैतिकता में धर्म का पुट खोजना अनावश्यक प्रतीत होता है,अनेक आधुनिक विचारको ने भी नैतिकता को धर्म से रहित बताया है|
इनका मानना है कि धर्म ने ईश्वर के विचार को प्रस्तुत कर नैतिकता को हानि पहुंचाई है|
निष्कर्षतः- धर्म के लिए नैतिकता अनिवार्य है
नैतिकता के लिए किसी धर्म केआवरण की जरूरत नही है|
साभार- नव चिंतन दै.भा.

आतंकवाद जैसी बीमारी केंसर से भी घातक बीमारी है देश में माहौल ठीक नहीं है

आतंकवाद जैसी बीमारी केंसर से भी घातक बीमारी है देश में माहौल ठीक नहीं है शिक्षा में बहुत सुधार की जरूरत है युवा भटक रहे है साइंस या अन्य विषय की भागदौड़ में संस्कार या एक समर्पित राष्ट्र की भावना लुप्त होती जा रही है आधुनिक विषयों के साथ नीतिमय या दार्शनिक विचारधारा वाले अनिवार्य विषय भी सम्मिलित सरकार को करना चाहिए ताकि राष्ट्रहित की भावना तथा भारतीय संस्कृति उनके अंदर हमेशा समाहित रहे आधुनिकता में बहके नहीं
कर्म का विधान ही संस्कृति का परिचायक है |संस्कृत जैसे विषयों को उच्चतर काक्षाओ में प्रोन्नत करना चाहिए कक्षा 12 वी तक तो कम से कम अनिवार्य विषय के रूप में सरकार को लागू कर देना चाहिए |

शिक्षा के प्रसन्न मुद्रा के अनूठे पल




संस्कृत - दिवस के पावन - पर्व पर - महाकवि कालिदास

संस्कृत - दिवस के पावन - पर्व पर - महाकवि कालिदास
" पुरा कवीनां गणना प्रसंगे कनिष्ठिकाधिष्ठित कालिदासः ।
अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावात् अनामिका सार्थवती बभूव ॥ "
प्राचीन - काल में कवियों की गणना के प्रसंग में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण कालिदास का नाम कनिष्ठिका पर आया , किन्तु आज तक उनके समकक्ष कवि के अभाव के कारण , अनामिका पर किसी का नाम न आ सका और इस प्रकार अनामिका का नाम सार्थक हुआ । कालिदास कवि - कुल - गुरु माने जाते हैं । उन्होंने अपने विषय में कभी कुछ नहीं कहा , किन्तु उनकी रचनायें ही उनका सम्यक् एवम् सटीक परिचय देती हैं । परम्परानुसार कालिदास उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में से एक थे ।
कालिदास ने सात ग्रन्थ लिखे हैं-
1- अभिज्ञानशाकुन्तलम् - कालिदास का यह नाटक देश - विदेश में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ । यह सात अंकों में विभाजित है । इसमें शकुन्तला एवम् दुष्यन्त की प्रणय - गाथा एवम् "भरत" के जन्म की कथा का वर्णन है ।
ग्रन्थ के आरम्भ में कालिदास ने शिव - पार्वती की वन्दना की है -
" या सृष्टिः स्त्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तःश्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः सर्वबीज प्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः
प्रत्यज्ञाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः ॥"
जो स्त्रष्टा की प्रथम सृष्टि है , वह अग्नि और विधिपूर्वक हवन की हुई आहुति का वहन करती है , जो हवि है और जो होत्री है , जो दो सूर्य और चन्द्र का विधान करते हैं , जो शब्द - गुण से युक्त होकर आकाश और सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त किए हुए हैं , जिस पृथ्वी को सम्पूर्ण बीजों का मूल कहा जाता है और जिस वायु के कारण प्राणी , प्राण को धारण करते हैं , भगवान शिव प्रसन्न होकर अपने इन आठ रूपों के द्वारा हमारी रक्षा करें ।
" अभिज्ञानशाकुन्तलम् " की कथा आश्रम के आस - पास घूमती है । आश्रम में ही शकुन्तला एवम् दुष्यन्त का प्रथम - मिलन होता है । शकुन्तला के सौन्दर्य - वर्णन में , कालिदास की लेखनी खूब चली है । शकुन्तला के विषय में वे कहते हैं - " वह अनघ पवित्र रूप , अनसूँघा - सुमन नखाघात से अछूता किसलय , अनबिंधा - रत्न अनास्वादित नव - मधु और अखण्ड पुष्पों के फल के समान है । विधाता न जाने किसे , इस सौन्दर्य के उपभोग की पात्रता देगा ? "
2 - विक्रमोर्वशीयम् - यह नाटक पॉच अंकों का है , जिसमें पुरुरवस और उर्वशी के प्रणय एवम् विवाह का वर्णन है । नाटक के आरम्भ में कवि ने शिव - स्तुति की है -
" वेदान्तेषु यमाहुरेकपुरुषं व्याप्य स्थितं रोदसी
अस्मिन्नीश्वर इत्यनन्यविषयः शब्दो यथार्थाक्षरः।
अन्तर्यश्च मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मग्यते
स स्थाणुःस्थिरभक्तियोगसुलभो निःश्रेयसायास्तु वः॥
जिसे वेदान्त में परम - पुरुष कहा गया है , जो पृथ्वी और आकाश को व्याप्त करने के बाद भी शेष है , जो अकेला यथार्थाक्षर , ईश्वर नाम को धारण करता है , मोक्ष चाहने वाले , प्राणादि का संयम करके जिसे ज्ञानी अपने अन्तर्मन में ढूँढते हैं , वह स्थिर भक्ति - योग से सहज ही प्राप्त होने वाला स्थाणु हमारा कल्याण करे ।
विक्रमोर्वशीयम् में कालिदास ने कहा है - जिस प्रकार नदी का प्रवाह विषम शिलाओं से अवरुध्द होकर अधिक बलवान हो जाता है , उसी प्रकार प्रेम के मार्ग में , बाधाओं के आने से , प्रेम की तीव्रता सौ - गुना बढ जाती है । विक्रमोर्वशीयम् में मानवी और अतिमानवी का मेल है । उर्वशी का चरित्र उदार है । पुरुरवस प्रेम में आनन्द - मग्न है । वह प्रेम की तुलना में राज - पाठ को तुच्छ समझता है । इस नाटक में , ईश्वर की उपलब्धि को , भक्ति के द्वारा सुलभ बताया गया है ।
3 - मालविकाग्निमित्रम् - इस नाटक में पॉच अंक हैं । यह मालविका एवम् अग्निमित्र की प्रणय - गाथा है । इसका प्रथम श्लोक इस प्रकार है-
" एकैश्वर्ये स्थितोSपि प्रणतबहुफले यः स्वयं कृत्तिवासा:
कान्तासम्मिश्रदेहोSप्यविषयमनंसा यः पुरस्ताद्यतीनाम् ।
अष्टाभिर्यस्य कृत्सनं जगदपि तनुभिर्बिभ्रतो नाभिमानः
सन्मार्गालोकनाय व्यपनयतु स वस्तामसीं वृत्तिमीशः॥"
इस श्लोक में ईश्वर से यह प्रार्थना की गई है कि- जो अपने भक्तों को प्रभूत फल देने वाले , परम - ऐश्वर्य में स्थित होकर भी जो गज- चर्म को वस्त्र के रूप में धारण करते हैं , जो पत्नी से मिश्रित तन वाला होकर भी , विषयों से परे मन वाला है , यतियों का अग्रणी है , जो अपने आठ शरीरों से जगत को शारण करने के पश्चात् भी अहंकार- शून्य है वे शिव हमें सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें और हमारी तामसी - वृत्ति को दूर करें । यह प्रार्थना गायत्री मन्त्र से एवम् बृहदारण्यक् की इस प्रार्थना से मिलती - जुलती है-
" असतो मा सद् गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्मा अमृतं गमय ॥"
बृहदारण्यक् - 1 - 3 - 27
मालविकाग्निमित्र में रानी को धारिणी कहा गया है क्योंकि वह प्रत्येक स्थिति को धारण करती है । जब मालविका राजा का ध्यान , नृत्य - प्रसंग की ओर ले जाना चाहती है तो रानी राजा को समझाती है और दायित्व - निर्वाह हेतु प्रेरित करती है । वह आदर्श पत्नी है ।
4 - रघुवंश - यह कालिदास का महाकाव्य है । इसमें 19 सर्ग हैं । रघुवंश में सूर्यवंशी राजाओं के पराक्रम का वर्णन है - रघुवंश के प्रथम - श्लोक में कवि कहते हैं -
" वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥"
वाणी और अर्थ के समान मिले हुए जगत के माता - पिता , शिव - पार्वती की , वाणी और अर्थ की प्राप्ति के लिए मैं कालिदास वन्दना करता हूँ ।
रघुवंश के राजा दिलीप का वर्णन करते हुए कालिदास कहते हैं कि - जिस प्रकार सूर्य , समुद्र से जल लेता है , कि उसे वर्षा- काल में अनन्त- गुना अधिक लौटा सके , उसी तरह राजा दिलीप , प्रजा से 'कर' लेते थे , ताकि वे कई गुना अधिक कर के प्रजा को लौटा सकें ।
अज के राज्य में प्रत्येक मनुष्य यह सोचता है कि वह राजा का मित्र है । हमारी संस्कृति में आज भी आदर्श राज्य को राम - राज्य कहने की प्रथा है । राजा , प्रजा का पिता - समान माना जाता है क्योंकि वह प्रजा की शिक्षा की व्यवस्था करता है , उसकी रक्षा करता है और उसका भरण - पोषण करता है । कालिदास , विवाह की परिणति सन्तान - उत्पत्ति को मानते हैं कि - दिलीप और सुदक्षिणा का प्रेम सन्तान - प्राप्ति के बाद और बढ गया । कालिदास ने अज और इन्दुमती के विषय में कहा है - यदि ब्रह्मा परस्पर स्पृहणीय इन दोनों का संयोग न होने देता तो इन्हें सुन्दर बनाने का उनका श्रम , व्यर्थ हो जाता । धर्म का ध्येय , पुनर्जन्म से मुक्ति पाना है , जिसकी कामना , दुष्यन्त ने शाकुन्तलम् के अन्तिम श्लोक में की है -
" ममापि च क्षपयतु नीलकण्ठः पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभूः ।"
5 - कुमारसम्भव - यह महाकाव्य है और इसमें शिव एवम् पार्वती के विवाह का वर्णन है तथा युध्द के देवता कुमार कार्त्तिकेय के जन्म की कथा है । कुमारसम्भव के प्रथम श्लोक में कवि कालिदास ने हिमालय - प्रदेश की संस्कृति को विश्व की संस्कृति का मानदण्ड बताते हुए कहा है -
" अस्युत्तरस्यॉ दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः ।
पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्यॉ इव मानदण्डः ॥"
" उत्तर - दिशि में देव - हिमालय प्रहरी बनकर तना खडा है ।
उत्ती- बूडती दक्खिन में सागर इस धरती का मान बडा है ॥ "
भारत की संस्कृति मूलतः आध्यात्मिक है । प्रायः मनुष्य इस भौतिक जगत के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर सकता है किन्तु मनुष्य जीवन का ध्येय उस निरपेक्ष - सत्ता की अनुभूति - मात्र है । हम अपनी आत्मा के माध्यम से उस अनन्त सर्व- शक्तिमान परमात्मा तक पहुँच सकते हैं । " आत्मानमात्मना वेत्सि ।" कुमारसम्भव , 2- 10 .
" स्वयं विधाता तपसः फलानां केनापि कामेन तपश्चचार । " कुमारसम्भव , 1- 57 .अर्थात् विधाता का रूप तपोमय है , वे स्वयं तप करते हैं और दूसरों को तप का फल प्रदान करते हैं । कालिदास ने धर्म के सभी रूपों को ग्राह्य बताया है । मनुष्य अपनी रुचि के अनुसार किसी भी रूप की आराधना कर सकता है , क्योंकि सभी देवता उस परमात्मा के ही रूप हैं । कुमार कार्त्तिकेय का जन्म आवश्यक था क्योंकि तारक नाम के दैत्य से मानवता की रक्षा करनी थी , इसलिए गौरी - शंकर का विवाह आवश्यक था । " अनेन धर्मः सविशेषमाद्य मे त्रिवर्गसारः ।" कुमारसम्भव , 5- 38 . उमा ने शिव को पाने हेतु प्रयास किया किन्तु अपनी देहयष्टि के सौन्दर्य से नहीं । उन्होंने अपने हृदय को समर्पित किया । उनकी आस्था केवल धर्म पर स्थित रही । " अयप्रभृत्यवनतांगि तवास्मि दासः ।" भगवान शिव द्वारा यह कहने पर कि - " हे युवती ! आज से मैं तुम्हारा तप द्वारा , खरीदा हुआ दास हूँ । " पार्वती की तपोजन्य क्लान्ति मिट गई ।
6 - मेघदूत - यह 129 श्लोकों में रचित , एक गीति - काव्य है । इस काव्य में एक यक्ष्य , मेघ को सन्देश - वाहक बना कर , अपनी प्रेयसी के लिए सन्देश भेजता है । " मेघदूत " प्रेम - काव्य है और इससे प्रेरित होकर , अनेक रचनायें लिखी गई हैं , किन्तु मेघदूत का अपना अलग महत्त्व है । पावस , प्रकृति एवम् प्रेम का , अनूठा चित्रण मेघदूत में उपलब्ध है । कालिदास , प्रेम के अमर - गायक हैं । यक्ष , अपनी प्रेयसी का वर्णन करते हुए मेघ से कहते हैं -
" तन्वी श्यामा शिखरिदशना पक्वबिम्बाधरोष्ठी
मध्ये क्षामा चकितहरिणीप्रेक्षणा निम्ननाभिः ।
श्रोणीभारादलसगमना स्तोकनम्रा स्तनाभ्याम्
या तत्र स्याद्युवतिविषये सृष्टिराद्येव धातुः ॥ "
विधाता की प्रथम स्त्री - सृष्टि के समान तन्वी , श्यामा , भुट्टे के समान दॉतों वाली , पके कुँदरू के समान लाल होंठ और अधर वाली , क्षीण कटि वाली , सहमी हुई हरिणी के समान नयन वाली , गहरी नाभि वाली , नितम्बों के भार से मन्द - मन्द चलने वाली , और स्तनों के भार से कुछ झुकी हुई , वह वहॉ होगी । "
सम्भवतः रामायण में वर्णित राम के विरह से , कालिदास को " मेघदूत " लिखने की प्रेरणा मिली होगी ।
7 - ऋतुसंहार - इसमें छ्हः सर्ग हैं , जिसमें 144 श्लोक हैं । ऋतुसंहार में ग्रीष्म , वर्षा , शरद , हेमन्त , शिशिर और हेमन्त का हृदयग्राही वर्णन हुआ है । ऋतुसंहार का अर्थ है - ऋतुओं का समूह ।
" नितान्तनीलोत्पलपत्रकान्तिभिः क्वचित् प्रभिन्नाञ्जनराशिसन्निभैः ।
क्वचित् सगर्भप्रमदास्तनप्रभैः समाचितम् व्योम घनैः समन्ततः ॥ 2- 2
कालिदास की लेखनी में अद्भुत क्षमता है । वे प्रकृति - चित्रण करें या भाव - चित्रण , उनके वर्णन में एक चित्रकार की दृष्टि और एक नर्तक की भँगिमायें होती हैं । शब्दों को पढने मात्र से, दृश्य दिखाई देने लगते हैं । उनके शब्द - चित्र सुन्दर भी हैं और सजीव भी । भारत की महिमा - मण्डित संस्कृति को, कालिदास ने न केवल आत्मसात किया, अपितु उसे समृध्द और सार्वभौम बना दिया । कालिदास एक महान कवि हैं । वे भारतीय - संस्कृति के उन्नायक हैं ।

मीठे वचन

 अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैवकुटम्बकम्॥
- यह मेरा है, वह उसका है जैसे विचार केवल संकुचित मस्तिष्क वाले लोग ही सोचते हैं। विस्तृत मस्तिष्क वाले लोगों के विचार से तो वसुधा एक कुटुम्ब है।
* सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत्।
यद्भूतहितमत्यन्तं एतत् सत्यं मतं मम्।।
- यद्यपि सत्य वचन बोलना श्रेयस्कर है तथापि उस सत्य को ही बोलना चाहिए जिससे सर्वजन का कल्याण हो। मेरे (अर्थात् श्लोककर्ता नारद के) विचार से तो जो बात सभी का कल्याण करती है वही सत्य है।
* सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात ब्रूयान्नब्रूयात् सत्यंप्रियम्।
प्रियं च नानृतम् ब्रुयादेषः धर्मः सनातनः।।
- सत्य कहो किन्तु सभी को प्रिय लगने वाला सत्य ही कहो, उस सत्य को मत कहो जो सर्वजन के लिए हानिप्रद है, (इसी प्रकार से) उस झूठ को भी मत कहो जो सर्वजन को प्रिय हो, यही सनातन धर्म है।

* क्षणशः कणशश्चैव विद्यां अर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥
क्षण-क्षण का उपयोग सीखने के लिए और प्रत्येक छोटे से छोटे सिक्के का उपयोग उसे बचाकर रखने के लिए करना चाहिए। क्षण को नष्ट करके विद्याप्राप्ति नहीं की जा सकती और सिक्कों को नष्ट करके धन नहीं प्राप्त किया जा सकता।
* अश्वस्य भूषणं वेगो मत्तं स्याद गजभूषणम्।
चातुर्यं भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणम्॥
तेज चाल घोड़े का आभूषण है, मत्त चाल हाथी का आभूषण है, चातुर्य नारी का आभूषण है और उद्योग में लगे रहना नर का आभूषण है।
भगवान बुद्ध के विचारों की वर्तमान समय से प्रासंगिकता      विचारक-किशन गोपाल मीना टी जी टी संस्कृत  केंद्रीय विद्यालय सवाई माधोपुर (राजस्थान)संसार की रचना अदभूत है प्राकृतिक सौंदर्यता विशाल समुद्र ,नीले गगन की असीम सुंदरता ,कल –कल बहते झरने ,ऊंचे-ऊंचे पर्वत ,विविध जीव मानों सृष्टि में तीनों लोकों की मानों सकल चारुता रस घोल दिया हो |विशेष कर मानव कृति के लिए तो सारे गुण ,सुंदरता ,दयालुता ,कारुण्यभाव आदि प्रदान कर मानों देवताओं के साथ भेदभाव किया हो |मानव जीवन इस जगत का सर्वोपरि जीव है देवता भी इस देह के लिए आशा रखते है |
तुलसीदासजी ने रामचरित मानस मे लिखा है ------       बड़े भाग मानुष तन पावा |                                       
सुर दुर्लभ सब ग्रंथ न गावा ||
ईश्वर ने सभी जीवों को बराबर का हक दिया है किसी के साथ भेदभाव नहीं किया है |इहलोक में सब प्रेम से रहते है |परंतु कुछ मानव ईश्वर की दी हुई शक्ति का दुरुपयोग कर रहे है ,विशेष कर निजी स्वार्थ वश इस जगत में अनर्थ कार्य कर रहे है | जिससे पृथ्वी के अनेक हिस्से विभाजित हो गए वो अलग-अलग देश के नाम से जाने गए है |आज के समय में जाति भेदभाव ,धर्म ,वर्ण  आदि को माध्यम बनाकर सम्पूर्ण विश्व में कोहराम मचा हुआ सभी जगत के जीवों में आपसी गहरी खाई बनाने का काम किया जा रहा है जिसको धर्म की रक्षा मानते है |
ऐसे व्यक्तियों को भगवान बुद्ध के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए उन्होने समस्त धरातल को एक पिता –माता की संतान की संज्ञा दी थी |शास्त्रों ठीक कहा है ----उदारचरितानां वसुधैव कुटुम्बकम “पृथ्वी हि हमारा परिवार है |
आज भी बुद्ध के विचार संसार में कीर्तिस्तंभ की तरह जगत के जीवों को आपसी भाई-चारे का संदेश ,अहिंसा,कल्याण ,लोक हित आदि से देदीप्यमान है |भारत में जन्मी इस बोद्दिक  विचारधारा से अनेक देश प्रभावित हुए ,जैसे –श्रीलंका ,जापान ,चीन,सिंगापूर आदि अनेक देश बुद्दमय हो गए |विचारों में निर्वाण से भी महानिर्वाण की प्राप्ति जब तक लोभ,स्वार्थ,मोह,निजभाव आदि जीवन के शत्रु है इनसे मुक्ति पाना महानिर्वाण कहा गया है |
आज के युग में इनके विचारों से ही जगत में आपसी प्रेम भाईचारा वापिस पुनर्जीवित किया जा सकता है ,क्योंकि भगवान बुद्द के विचार ही जीवन के परम कल्याण की कुंचिका है |आतंकवाद ,नक्सल्वाद ,धार्मिक शत्रुता ,सरहदे ,
आदि पीड़ाए भोली निर्दोष प्रजा को आपसी वैमनस्यता में जलाकर राख़ कर रही है |वर्तमान में भगवान बुद्द के जीवन के मुख्य पहलू प्रासंगिक है राजमहल त्याग देना ,निर्वाण प्राप्ति की और आगे अग्रसर होना ,पीड़ितो की सेवा करना |वर्तमान में सभी देश सुख-दुख में एक दूसरे की सहायता करनी चाहिए ,प्राकृतिक आपदा में सहयोग की भावना ,बड़े देश छोटे देशों पर स्वामित्व न जमाए आदि भावनाए हमे पाशविक प्रवृति से बचा सकती है |इस संसार को एकसूत्र में केवल भगवान बुद्द के विचार ही पिरो सकते है | हमें आज सभी को एक संकल्प लेना चाहिए की सम्पूर्ण पृथ्वी ही हमारा समाज अथवा परिवार है |
स्वयं के विचारों पर आधारित कवितामानवता का अपमान न कर जीवन भर रोएगा |
दो दिन  का सुख आजीवन शोक भर जाएगा ||
धर्म वर्ण जाति की जंजीरे रोक न पाएगी बर्बादी |
समरसता संभाव त्याग जगत के है रक्षाकारी ||   भगवान बुद्ध के विचारों की वर्तमान समय से प्रासंगिकता      विचारक-किशन गोपाल मीना टी जी टी संस्कृत  केंद्रीय विद्यालय सवाई माधोपुर (राजस्थान)

संस्कृत भाषा के विषयों को पढकर रोजगार की तलाश में भटक रहे युवा को हरेक अवसर पर रोजगार का मुद्दा उठाते रहते हैं।

संस्कृत भाषा के विषयों को पढकर रोजगार की तलाश में भटक रहे युवा को हरेक अवसर पर रोजगार का मुद्दा उठाते रहते हैं। यह स्वाभाविक है। हमें भी अत्यन्त पीडा होती है। ऐसे युवा सोचते हैं, मैं संस्कृत पढा अतः रोजगार नहीं मिला यदि और विषय पढता तो रोजगार पा लेता। कृपया हताशा में ऐसा भ्रम न पालें। आज रोजगार एक व्यापक समस्या है। आज कोई भी शिक्षा शतप्रतिशत रोजगार की गारंटी नहीं है। हरेक रोजगार प्रदाता एक गुणवत्ता युक्त सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को चुनना चाहता है। हमें अपने विवेक से भी स्व रोजगार को ढूँढना होगा।